कवि और दुनिया

Writer: विस्लावा शिम्बोस्र्का

Wisława Szymborska, Poland

Title: The Poet and the world

Noble Prize Recipient 1996 

Translator: Anuradha Mahendra  

1923 में कारकोन में जन्मीं पोलैंड की कवयित्री विस्लावा शिम्बोस्र्का को 1996 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया था. गहरी राजनीतिक चेतना और सामाजिक विडम्बनाओं वाली इस कवयित्री ने अपनी रचनाओं की सादगी और गहराई से पाठकों को भीतर तक छुआ है. प्रस्तुत है नोबेल पुरस्कार प्राप्त करते समय दिया गया उनका व्याख्यान. 

कहते हैं किसी व्याख्यान में सबसे मुश्किल पहला वाक्य होता है. खैर, वह तो मैंने पार कर लिया. पर मु»ो तो लगता है कि इसके बाद भी सभी वाक्य – तीसरा, छठा, दसवां और अंतिम पंक्ति तक पहुंचाने वाला हर वाक्य मेरे लिए उतना ही मुश्किल होगा, क्योंकि मु»ो कविता पर बोलना है. मैंने इस बाबत बहुत कम कहा है – लगभग नहीं के बराबर. और जब कभी मैंने कुछ कहा तो हमेशा मेरे भीतर चोरी-छिपे एक आशंका आ बैठी कि यह काम मेरे वश का नहीं है. यही वजह है मेरा यह व्याख्यान छोटा ही होगा. कमियों को आसानी से पचाया जा सकता है अगर वह थोड़े-थोड़े अनुपात में परोसी जाएं. 

हमारे समकालीन कवित अविश्वास और संशय से भरे हुए हैं - खासकर स्वयं को लेकर. वे अपने कवि होने को एक अनमनेपन से कबूल करते हैं, गोया इसके लिए कुछ शर्मिंदा हों. पर हमारे आज के इस कोलाहलपूर्ण समय में अपनी खामियों को स्वीकार कर लेना ज्«यादा आसान है, बशर्ते उन्हें जरा आकर्षक तरीके से पेश किया जाए. इसके बनिस्बत अपनी खूबियों को पहचाना मुश्किल काम है, क्योंकि ये हममें कहीं गहरे छिपी रहती हैं. दूसरे, हमारे आज के कवियों की जब कभी किसी अजनबी से मुलाकात होती है या जब कभी इनके सामने कोई प्रश्नावली भरने की नौबत आती है या यूं कहें कि जब कभी ऐसी स्थिति आती है कि अपने काम के बारे में बताये बगैर कोई चारा नहीं होता हो तो ये कवि लोग ‘कवि’ कहलवाने के बजाय एक सामान्य शब्द ‘लेखक’ के रुप में परिचय देना ज्«यादा पसंद करते हैं अथवा वे ‘कवि’ की जगह पर किसी दूसरे ऐसे कार्य से जोड़कर खुद को पेश करते हैं जो वे लेखन के अलावा करते हैं. किसी दफ़्तर के अफसर से लेकर बस में बैठे मुसाफिरों तक को जब पता चलता है कि उन्हें किसी कवि से पेश आना है तो उनके व्यवहार में संदेह और अतिरिक्त सजगता आ जाती है. मु»ो लगता है कि दार्शनिकों के साथ भी शायद कुछ इसी तरह का घटता है. फिर भी वे बेहतर स्थिति में हैं, क्योंकि गाहे-ब-गाहे वे खुद को विद्वान होने की गरिमा से मंडित कर सकते हैं. ‘दर्शनशास्त्र का प्रोफेसर’ – ओेह! यह वाकई कितना सम्मानजनक-सा ध्वनित होता है. 

पर कोई ‘कविता का प्रोफेसर’ नहीं होता. यदि होता तो इसका अर्थ यह निकलता कि काव्य-सृजन एक पेशा है जो विशेषज्ञतापूर्ण अध्ययन, नियमित परीक्षाओं, संदर्भ सूचियों और पाद टिप्पणियों से भरे सैद्धांतिक लेखों और अंतत: दीक्षांत समारोहों में सम्मान के साथ दिये गये डिप्लोमा- डिग्रियों के द्वारा हासिल किया जा सकता है. इसका अर्थ यह भी होता कि कवि बनने के लिए सुंदर कविताओं के पन्ने पर पन्ने रंग डालना ही पर्याप्त नहीं है, ज्«यादा जरुरी है शासकीय मुहर लगा कागज का टुकड़ा. आपको याद होगा रुसी कविता के उत्कृष्ट कवि जोसेफ ब्रौडस्की को, जिन्हें बाद में नोबेल पुरस्कार मिला, एक बार ठीक इन्हीं वजहों से निर्वासन की सजा दी गयी थी. उन्होंने ब्रौडस्की को ‘परजीवी’ (पैरासाइड) करार दिया था, क्योंकि उनके पास वह शासकीय प्रमाणपत्र नहीं था जो उन्हें कवि होने का अधिकार दिलाता. 

बरसों पहले ब्रौडस्की से व्यक्तिगत रुप से मिलने का सौभाग्य मिला और मैंने पाया कि तब तक मैं जितने भी कवियों को जानती थी उनमें सिÒ«îá वही थे जिन्हें अपने कवि होने पर गर्व था. वे बिना किसी संकोच के खुद को कवि कहलाना पसंद करते थे. वे दूसरे कवियों से एकदम अलग थे. वे अपने कवि होने को एक विद्रोही किस्म की मुक्ति के साथ सामने रखते थे. मु»ो लगा कि वे इसलिए ऐसा कर सके क्योंकि युवावस्था में उन्होंने जो क्रुर अपमान »ोला था, उसकी स्मृतियां इस शब्द के साथ उनके जे«हन में बसी हुई थीं. 

वे देश ज्यादा भाग्यशाली हैं, जहां मानवीय गरिमा को इस तहर आनन-फानन में कुचला नहीं जाता. कवियों की ख्वाहिश होती है कि वे प्रकाशित हों, उन्हें पढ़ा जाए, समझा जाए, पर वे सामान्य भीड़ से अलग अपनी पहचान बनाने और रोजमर्रा की चक्की में पिसने से बचकर शायद ही कुछ कर पाते हैं. ज्«यादा पुरानी बात नहीं है जब ऐसा नहीं होता था. इसी सदी के शुरुआती दशकों में कवियों ने अपने अजीबोगरीब पहरावों और सनक-भरे आचरण से हमें चौंकाना चाहा था. पर यह सब महज सार्वजनिक प्रदर्शन की चीज थी. अक्सर ऐसे क्षण आये जब कवियों को अपने आडम्बर, ताम-झाम और दूसरे काव्यमय वसन-भूषण उतारकर बंद कमरे में एक कोरे कागज का सामना करना पड़ा –धीरज के साथ, अपने ‘निजत्व’ की प्रतीक्षा करते हुए आखिरकार यही था जो वास्तव में मायने रखता था. 

यह संयोग नहीं है कि बड़े-बड़े वैज्ञानिकों और कलाकारों की फिल्म जीवनियां धड़ल्ले से निर्मित की जाती हैं. ज्«यादा महत्त्वाकांक्षी निर्देशक हुआ तो वह बड़े विश्वसनीय तरीके से उस सारी सृजनात्मक प्रक्रिया को पुनर्निमित करना चाहता है जिससे गुजरकर महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक खोजों और उत्कृष्ट कलाकृतियों ने जन्म लिया. और कुछ खास तरह के वैज्ञानिक श्रम को किसी हद तक चित्रित किया भी जा सकता है. प्रयोगशालाएं, छोटे-बड़े उपकरण और भारी-भरकम मशीनों को जीवंत दिखाया जा सकता है; ऐसे दृश्य कुछ समय तक के लिए दर्शक को बांध भी लेते हैं. और फिर क्लाइमेक्स का वह रोमांचक क्षण -क्या थोड़े-थोड़े परिवर्तनों के साथ हजार बार दोहराया गया वह प्रयोग इस बार कामयाबी को छू सकेगा? यह सब बहुत नाटकीय हो सकता है. चित्रकारों के बारें में दिखायी गयी फिल्में भव्य हो सकती हैं, क्योंकि उनमें किसी प्रसिद्ध चित्र के धीरे-धीरे आकार लेते जाने को पुनर्सर्जित किया जा सकता है – पेंसिल स्केच से लेकर अंतिम ब्रश स्ट्रोक तक. संगीतकारों पर बनी फिल्मों में संगीत की बहार रहती है- संगीतकार के कानों में जन्मी स्वरलहरी की पहली थिरकन से वाद्यवृंद की एक परिपक्व प्रस्तुति तक की सम्पूर्ण यात्रा! हां, पर यह सब बहुतक बचकाना और सीधा-सपाट है और इसमें कहीं भी उस रहस्यमय मानसिक अवस्था के बारे में कुछ पता नहीं चलता जिसे आमतौर पर अंत:प्रेरणा कहा जाता है. पर इन फिल्मों में कम से कम कुछ तो ऐसा मौजूद होता ही है जिसे देखा जा सकता है, सुना जा सकता है. 

इस मामले में कवियों की स्थिति एकदम निराशाजनक है. उनका काम कहीं से भी फोटोजेनिक नहीं होता. कोई शख्स एक मेज पर बैठा रहता है या सोफे पर लेटा रहता है और एकटक दीवार या छत को घूरता रहता है. कभी-कभार यह शख्स कुछ पंक्तियां लिखता है, पर पंद्रह मिनट बाद ही उन्हें काट भी देता है. उसके बाद फिर एक और घंटा बीत जाता है, इस दौरान कुछ भी नहीं घटता. इस तरह के दृश्य को देखने में भला किसकी रुचि हो सकती है? 

मैंने अंत:प्रेरणा का जिक्र किया. समकालीन कवियों से जब आप पूछें कि यह क्या है और क्या सचमुच ऐसी कोई चीज होती है तो वे टालमटोल के जवाब देने लगते हैं. ऐसा नहीं है कि उन्होंने अपने भीतर कभी इस सृजनात्मक आवेग को अनुभव नहीं किया हो, पर बात सिर्फ इतनी है कि जिस चीज को आप खुद न समझ पा रहे हों, उसे दूसरों को कैसे बताया जाए?

कभी-कभार जब मुझसे इस बारे में पूछा गया है तो मैं भी अचकचा गयी हूँ, हालांकि मेरा कहना यह है कि अंत:प्रेरणा पर कवियों-कलाकारों का ही विशेषाधिकार नहीं है. इस संसार में हमेशा से कुछ ऐसे लोग रहे हैं, आज भी हैं और हमेशा रहेंगे, जिनके दरवाजों पर अंत:प्रेरणा दस्तक देती है. ये वे तमाम लोग हैं, जो अंतरात्मा की आवाज सुनते हैं और अपना काम भरपूर प्रेम और कल्पना में डूबकर करते हैं. डौक्टर, शिक्षक, माली और सैकड़ों ऐसे लोग हो सकते हैं. जब तक वे अपने काम में नयी-नयी चुनौतियों को खोजते रहते हैं, उनका काम अनवरत रोमांच से भरा रहता है. मुश्किलें एवं असफलताएं उनकी जिज्ञासाओं का शिथिल नहीं कर पातीं. ये लोग जिस किसी समस्या को सुलझाते हैं, उसी में से तमाम तरह के नये-नये प्रश्न उभरते हैं. अंत:प्रेरणा चाहे जो हो, वह एक अनवरत अहसास….. ‘मुझे नहीं मालूम’ की अभिव्यक्ति से जन्म लेता है. 

लेकिन इस संसार में इस तरह के लोग ज्«यादा नहीं हैं. धरती पर अधिकांश लोग बस किसी तरह जीते चले जाते है. वे काम करते हैं क्योंकि उन्हें काम करना पड़ता है. उन्होंने इस काम या उस काम को इसलिए नहीं चुना कि उसमें एक नशा, उन्माद है, बल्कि उनकी जिंदगी की परिस्थितियों ने उस काम को उनके लिए निर्धारित कर दिया है. इस तरह के प्रेमविहीन कार्य, एक उबाऊ किस्म के काम, जिनका महत्त्व सिÒ«îá इसलिए है कि दूसरों के पास तो वह भी नहीं है/ यह मनुष्य के जीवन की सर्वाधिक भयावह विडम्बन है. और अभी इसके कोई आसार नजर नहीं आते कि आने वाली सदियों में इस ढर्रे में कोई परिवर्तन होगा. इसलिए हालांकि मैं अंत:प्रेरणा पर केवल कवियों का एकाधिकार नहीं मानती, पर फिर भी मैं उन्हें उन कुछ खास लोगों में गिनती हूं जिन पर नियति की कृपा रही है. 

इससे मेरे श्रोताओं के मन में कुछ शंकाएं पैदा हो सकती हैं. तमाम तरह के उत्पीड़क, तानाशाह, कट्टर और मतांध व्यक्ति, लोगों को उकसाने वाले, नारे उछालकर-लगाकर ताकत हथियाने में जुटे हुए लोग- इन सब को भी अपने काम में बड़ा आनंद आता है. ये सब भी अपने काम को कल्पनाशीलता भरे जोशो-खरोश के साथ अंजाम देते रहते हैं. बेशक! यह सच है. पर यह भी सच है कि वे ‘जानते हैं’ और जो कुछ, जितना उन्होंने जाना होता है, वही उनके लिए हमेशा हमेशा के लिए पर्याप्त होता है. वे और कुछ खोजना नहीं चाहते, क्योंकि हो सकता है नया जानना उनके तर्कों की ताकत को कम कर दे. पर कोई भी ज्ञान जो नये प्रश्नों की ओर लेकर नहीं जाता, जल्दी ही खत्म हो जाता है. लगातार जीते चले जाने के लिए जो ताप चाहिए ऐसा ज्ञान उस ताप को बनाये नहीं रख सकता. कुछ अतिवादी मामलों में तो ऐसा ज्ञान समाज के लिए विनाशक भी साबित हुआ है. प्राचीन और आधुनिक इतिहास में इसके बहुत से उदाहरण मिल जाएंगे. 

यही वजह है कि इस छोटे से कथन – ‘मैं नहीं जानती’ को मैं इतना ऊँचा स्थान देती हूं. यह छोटा-सा कथन है, पर इसकी उड़ान बहुत ऊंची है. यह हमारे जीवन को विस्तार देता है ताकि उसमें हमारे भीतर की खाली जगहें और वह बाहरी विराटता भी शामिल हो सके जिसमें हमारी यह छोटी-सी धरती जाने कब से तैर रही है. यदि आइजेक न्यूटन स्वयं से यह नहीं कहता कि ‘मैं नहीं जानता’, तो उसके छोटे से बगीचे में सेबों की बरसात भी होने लगती तो क्या होता! अधिक से अधिक यह होता कि वह »ाुककर उन्हें उठाता और चपड़-चपड़ भकोस जाता. मेरी हमवतन मादाम क्यूरी यदि खुद से यह नहीं कहती कि ‘मैं नहीं जानती.’ तो शायद वह एक अच्छे परिवारों से आयी लड़कियों को एक निजी हाईस्कूल में रसायनशास्त्र ही पढ़ाती रहती और एक प्रतिष्ठापूर्ण नौकरी में ही उसका जीवन बीत जाता. लेकिन वह लगातार कहती रही कि ‘मैं नहीं जानतीं’ और ये शब्द उसे एक नहीं, दो बार स्टौकहोम की धरती पर ले आये, जहां बेचैन और प्रश्नाकुल आत्माओं को यदा-कदा नोबल पुरस्कारों से नवाजा जाता है. 

कवि, यदि सच्चा है तो उसे भी बार-बार यह दोहराना होगा कि ‘मैं नहीं जानता’. हर कविता इसी कथन का जवाब देने का प्रयास करती है. पर जैसे ही चरमावस्था पृष्ठ पर अंकित होना चाहेंगी, कवि पुन: संदेह से भर उठेगा. उसे लगेगा की उसका यह उत्तर तो पूरी तरह गढ़ा हुआ है, अपर्याप्त है. इसलिए कवि लगातार प्रयास करता रहेगा और देर-सवेर उनके इस बेचैनी और प्रश्नाकुलता के परिणामों को उनकी कृतियां कहा जाने लगता है और साहित्यिक इतिहासकारों द्वारा उन पर विशालकाय कागजी बिल्ले चस्पां कर दिये जाते हैं. 

कभी-कभार मैं एक ऐसी स्थिति का स्वप्न देखती हूं जिसका सच होना सम्भव नहीं है. मैं एक जिद के साथ यह कल्पना करती हूं कि मैं सभी मानवीय प्रयासों की नि:सारता के उस हदयविदारक शोकगीत लिखनेवाले एक्लेसिएस्टेस के साथ गपशप कर रही हूं. मैं उसके सम्मुख नतमस्तक हो गयी हूं क्योंकि कम से कम मेरे लिए तो वह संसार के महानतम कवियों में से हैं. मैं उसका हाथ थामकर कहूंगी, “इस आसमान के नीचे नया कुछ भी नहीं है – यही तो तुमने लिखा है न एक्लेसिएस्टेस! पर तुम तो खुद इस आसमान के नीचे एकदम नये हो. तुमने जो कविता रची वह भी तो इस आकाश के तले एकदम नयी कविता है, क्योंकि तुमसे पहले ऐसा किसी ने नहीं रचा. और तुम्हारे पाठक भी इस धरती पर एकदम नये हैं, क्योंकि जो तुमसे पहले यहां मौजूद थे वे तो तुम्हारी कविता को पढ़ ही नहीं पाये. और यह जो सरु के वृक्ष के तले बैठे हो वह भी सृष्टि के आरम्भ से यहां नहीं रहा है. इससे पहले दूसरे सरु के वृक्ष अस्तित्व में आये थे पर उनमें से कोई इस वृक्ष के जैसा नहीं था. और एक्लेसिएस्टेस मैं तुमसे यह भी पूछना चाहती हूं - अब इस आकाश के तले किस नयी रचाना को लिख रहे हो? जो विचार तुम पहले भी अभिव्यक्त कर चुके हो, क्या उन्हीं को आगे बढ़ाओगे? या शायद उनमें से ही किसी बात को खारिज करने का तुम्हारा मन हो रहा है? तुमने अपनी पिछली रचना में सुख के बारे में कुछ कहा था. क्या फर्क पड़ता है यदि यह क्षणिक है! शायद इस आकाश के नीचे अब तुम्हारी नयी कविता फिर से सुख के बारे में हो? क्या तुमने कुछ टिप्पणियां दर्ज की हैं; क्या पहला मसौदा तैयार हो गया है? मु»ो पूरा संदेह है कि तुम कहोगे - हां, मैं सब कुछ लिख चुका हूं और नया लिखने को कुछ नहीं है मेरे पास.” दुनिया का कोई कवि ऐसा नहीं है जो यह कह सकता हो. और तुम जैसा महान कवि तो कदापि नहीं.” 

इस संसार की विराटता और अपनी नपुंसकता को लेकर जब हम भयभीत होते हैं तो चाहे जो सोचें; मनुष्यों, पशुओं और यहां तक कि पेड़-पौधों के अपने-अपने दुखों के प्रति इस संसार की उदासीनता (हमने यह क्यों मान लिया कि पेड़-पौधों को तकलीफ नहीं होती?) से हम चाहे जितने क्षुब्ध हों; हम इस धरती के विस्तार के बारे में जैसा भी सोचते हों, यह विस्तार उन सितारों से आने वाली रोशनी की किरणों से छिपा हुआ है जो इसे चारों तरफ से घेरे हुए है और जिन्हें अभी तो हमने खोजना आरम्भ ही किया है. क्या वे सितारे मर चुके हैं? क्या अभी भी वे मृत हैं? हमें कुछ नहीं मालूूम. यह अनंत और अपरिमित रंगभवन जिसमें हम आरक्षित टिकट लेकर बैठे हुए हैं, हम इसके बारे में जो भी सोचते रहें पर इन टिकटों की मियाद हास्यास्पद रुप में बहुत छोटी है. इन टिकटों को दो निरंकुश तारीखों ने घेरा हुआ है. हम इस दुनिया के बारे में जो कुछ सोचते रहें, पर यह बहुत विस्मयकारी दुनिया है. 

पर इसे ‘विस्मयकारी’ कहना इसे एक ऐसे विशेषण से युक्त करना है जिसमें उसका तार्किक ताना-बाना छिप जाता है. आखिरकार हमें उन्हीं चीजों से तो विस्मय होता है जो कुछ जाने-पहचाने और सर्वत्र स्वीकार्य मानदंडों से परे हटती हैं; जो उस प्रत्यक्षता से दूर चली जाती हैं जिसके हम आदि हो चुके होते हैं. किंतु सच तो यह है कि स्वत: स्पष्ट संसार जैसा कुछ भी नहीं होता. हमारा विस्मित होना स्वभावगत है और यह किसी और से तुलना पर आधारित नहीं है. 

माना कि अपनी रोजमर्रा की बातचीत में हम हर शब्द सोच-विचारकर नहीं बोलते. ‘साधारण दुनिया’, ‘आम जीवन’, ‘सामान्य परिस्थितियां जैसे तमाम जुलमों का हम धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं. पर कविता में जहां हर शब्द का वजन है, कुछ भी सामान्य या साधारण नहीं होता – न कोई पत्थर, न उस पर हुआ एक बादल का टुकड़ा, न कोई दिन, न उसके बाद आने वाली रात और न ही कोई अस्तित्व, चाहे वह दुनिया में किसी का भी असित्व हो. 

ऐसा लगता है कि इस दुनिया में कवियों के पास हमेशा वे काम होंगे जो केवल उन्हीं के लिए बने होंगे. 

{fcomment}

 

Search