खूबसूरती की सरहद का एक और द्वार

Translation of "The night I met Einstein" by Anuradha Mahendra   394244d16629b33d628b6e4ebfab75cf

लेखक: जेरौम वीडमैन (Jerome Weidman)1913-1998

अनुवादक: अनुराधा महेंद्र 

 

जेरौम वीडमैन का परिचय 

कहानीकार, उपन्यासकार एवं नाटककार के रूप में विख्यात जेरोम वीडमैन का जन्म 14 अप्रैल 1913 में मेनहटन,न्यू यार्क सिटी में हुआ था. उनके पिता एक यहूदी अप्रवासी और कपड़े के व्यापारी थे, इसलिए कुछ अरसे तक उन्होंने खुद भी वस्त्र उद्योग के क्षेत्र में काम किया और अपने इस क्षेत्र के  अनुभव को अपने लेखन में भी जगह दी है. अपनी मेहनत की कमाई से ही उन्होंने महाविद्यालय और विश्वविद्यालय की पढ़ाई पूरी की. इसी दौरान उन्होंने कहानियां लिखना शुरू कर दिया और कालांतर में उपन्यास भी लिखे. अपनी कहानियां में उन्होंने कारोबार और राजनीति के दांवपेंच और न्यूयार्क के दैनिक जीवन के बारे में खूब कलम चलाई है. कहानी कला में बेजोड़ महारत के अलावा उन्होंने फिल्मों में संवाद लेखन के रूप में भी अपनी क्षमता का परिचय दिया. अपनी इसी क्षमता के चलते न्यूयार्क के बेहद प्रसिद्ध फिल्मकार, निर्माता, निर्देशक जार्ज एबोट के साथ मिलकर एक संगीतात्मक नाटक ’फियोरेलो’ रचा, जिसे 1960 में पुलत्जिर पुरस्कार प्राप्त हुआ. उनके उपन्यासों एवं कहानी संग्रहों की एक लंबी फेहरिस्त है.

अल्बर्ट आइन्सटाइन के विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान से संसार भर में सभी परिचित हैं लेकिन संगीत में उनकी गहरी रुचि और ज्ञान के बारे में कम लोग ही जानते हैं. संगीत की बारीकियों, जटिलताओं की उनकी समझ अढ़्भुत थी। यहाँ इंग्लैंड  के प्रसिद्ध कथाकार जेरोम विडमन ने दुनिया के इस विश्व विख्यात वैज्ञानिक से अपनी मुलाक़ात का जो विवरण दिया है उससे संगीत में उनकी रुचि के अलावा उनके व्यक्तित्व की जिन खूबियों का पता चलता है वह मन को गहरे छू जाता है। ये वे खूबियाँ हैं जो किसी भी व्यक्ति को महान बनाती हैं और उसके संपर्क में आनेवाले हर शख्स को उसका मुरीद बना देती हैं। एक महान शिक्षक के रूप में इस विश्वविख्यात वैज्ञानिक ने जो गुर लेखक को सिखाये वे एक मधुर स्मृति के रूप में जीवन का विलक्षण अनुभव बनकर उन्हें ताउम्र प्रेरित करते रहे.

 

यह उन दिनों की बात है जब मैं किशोर उम्र का था और अपने जीवन की राह तलाशनी शुरू ही की थी. मुझे न्‍यूयार्क के लोकहित से जुड़े एक प्रतिष्ठित दानी के घर रात की दावत में शरीक होने का न्‍यौता मिला. भोजन के बाद हमारी मेजबान हम सबको अपने घर के विशाल ड्राइंग रुम में ले गई. कई सारे मेहमान अब भी पधारे रहे थे. वहाँ का नजारा देख मेरे पसीने छूट गए। मैंने देखा कि हाल में नौकर एक के पीछे एक करीने से छोटी कुर्सियाँ सजा रहे थे और सबसे आगे दीवार से टिकाकर वाद्ययंत्र रखे गए थे। जाहीर था मुझे संगीत के कार्यक्रम में शामिल होना पड़ेगा।

 

'होना पड़ेगा' मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि संगीत में मेरी कोई रुचि नहीं थी और मुझे इसका लेश मात्र भी ज्ञान नहीं था। सच कहूँ तो मैं संगीत के लिहाज से बहरा....या कहें कि एकदम पैदल था। सहज सी धुन भी मैं गुनगुना नहीं पाता था और गंभीर किस्म का कोई भी संगीत मेरे लिए शोर से ज्यादा कुछ नहीं था। इसलिए मैंने वही किया जो इस तरह की स्थिति में घिर जाने पर अक्सर करता था। मैं एक कुर्सी पर चुपचाप बैठ गया और जब संगीत शुरू हुआ तो चेहरे पर संगीत की गहरी समझ का भाव चस्पाँ कर लिया, भीतर से कान बंद कर लिये और खुद को बेतरतीब ख़यालों में डुबो दिया.    

 

कुछ देर बाद जब मैंने आस-पास के लोगों को दाद देते देखा तो मुझे लगा अब मैं अपने कान खोल सकता हूँ. उसी पल दायीं तरफ से मुझे कोमल पर गज़ब की भेदती आवाज सुनाई दी –"क्या तुम्हें बाख का संगीत पसंद है?" उस स्वर ने पूछा।

 

मुझे बाख के बारे में उतनी ही जानकारी थी जितनी न्यूक्लियर विखंडन की, लेकिन दुनिया भर में मशहूर चेहरों में से एक चेहरा जो इस वक्‍त मेरी बगल में बैठे थे, उनसे बेतरतीबी से बिखरे सफ़ेद बालों और मुंह में दबे पाइप की वजह से मैं बखूबी वाकिफ था। हाँ, मैं अल्बर्ट आइन्सटाइन की बगल में बैठा था.

 

"हूँ" असहजता और हिचकिचाहट से भर मैंने कहा.

 

मुझसे एक सहज सा सवाल किया गया था जिसका मुझे भी सहज सा जवाब देना था, पर अपने पड़ोसी की असाधारण आँखों में जो भाव था उससे मैं समझ गया कि वे शिष्टता के नाते महज रस्मी औपचारिकता नहीं निभा रहे हैं. इस मौखिक आदान-प्रदान का मेरे लिए चाहे जो महत्व हो पर मैं जानता था कि इस व्यक्ति के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है. और फिर सबसे महत्‍वपूर्ण बात यह थी इतनी बड़ी शक्सियत को कोई भला कैसे झूठ बोल सकता है बेशक कितना छोटा ही क्यूँ न हो?  

 

"मैं बाख के बारे में कुछ नहीं जानता?" मैंने बड़े संकोच से कहा. "मैंने आज तक उनका कोई संगीत नहीं सुना है?"

आइंस्टीन के संवेदनशील चेहरे पर असमंजस भरे आश्चर्य का भाव तेजी से उभरा. "तुमने बाख को कभी नहीं सुना?"

 

उनके स्वर में ऐसा भाव था मानो मैंने कह दिया हो कि मैं आज तक कभी नहीं नहाया.

 

"ऐसा नहीं कि मैं बाख को पसंद नहीं करता, या पसंद नहीं करना चाहता, दरअसल सुर ताल के लिहाज से मैं एकदम बहरा हूँ और सच तो यह है कि आज तक मैंने किसी का संगीत नहीं सुना."

यह सुनते ही उस उम्रदराज बूढ़े के चेहरे पर चिंता का भाव उभर आया. सहसा वे बोले, "प्लीज तुम मेरे साथ आओ."

 

वे खड़े हो गए और मेरा हाथ थाम लिया. भीड़ भरे उस विशाल कमरे में से जब वे मुझे हाथ पकड़ कर ले जा रहे थे तो शर्म के मारे मैंने अपनी नजरें जमीन में ही गड़ाए रखीं. हमारे इस तरह बीच में उठकर जाने से चकित लोगों की  फुसफुसाहट पीछे हाल में से साफ सुनाई दे रही थी पर आइंस्टीन ने उस पर ध्यान नहीं दिया.

 

दृढ़ कदमों से वे मुझे सीढ़ियों से ऊपर ले गए. जाहिर है वे उस घर से बखूबी परिचित थे. ऊपर की मंजिल पर पहुँचकर उन्होंने एक कमरे का दरवाजा खोला जहां करीने से किताबें रखीं हुईं थी, मुझे भीतर ले जाकर दरवाजा बंद कर दिया.

 

"अब" वे हल्की पर तकलीफ भरी मुस्कान बिखेरते हुए बोले, "प्लीज मुझे यह बताओ कि संगीत को लेकर तुम कब से ऐसा सोचते हो?"

 

"सदा से" मैंने डरते हुए कहा. "मेरा ख्याल है आप नीचे जाएँ डॉ आइंस्टीन, क्योंकि मेरे संगीत पसंद करने या नहीं करने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता."

 

उन्होंने तुरंत नहीं में सिर हिलाया और उनकी भोहें तन गईं, मानो मैंने कोई बेहूदा बात कह दी हो.

 

"प्लीज मुझे बताएं कि क्या ऐसा कोई भी संगीत है जिसे तुम पसंद करते हो?"

 

"मुझे ऐसे गाने पसंद हैं जिनमें शब्द होते हैं कुछ ऐसा जिसकी धुन को मैं पकड़ सकूँ?"

 

"वे मुस्कराये और खुश होकर गर्दन हिलाई, कोई उदाहरण दे सकते हो?"

 

"हाँ," मैंने साहस करते हुए कहा, "बिंग क्रोस्बी का कोई भी गीत."

 

उन्होंने फिर जोर से गर्दन हिलाई, "बहुत बढ़िया!"

 

वे कमरे के कोने में गए, फोनोग्राम खोला और रिकॉर्ड निकालने लगे. मैं असहज होकर देखता रहा. आखिर वे खुशी

से उछलकर बोले, "ये रहा!"

 

उन्होंने रिकॉर्ड लगाया और पल भर में ही कमरा बिंग क्रोस्बी के एक मंद, मधुर, गीत "When the Blue of the Night meets the God of the day" की स्वरलहरी से गूंज उठा, आइंस्टीन मुझे देख मुस्कराये और अपने पाइप की नली से समय निर्धारित किया. तीन या चार वाक्यांशों के बाद उन्होंने ग्रामोफोन बंद कर दिया.

 

"अब मुझे बताओ जो तुमने अभी अभी सुना?"

 

इसका सरल सा जवाब देने के लिए मैंने वही पंक्तियाँ गुनगुना दीं. मैंने भरसक कोशिश की कि धुन पर रहकर अपनी आवाज को टूटने न दूँ. उस वक़्त आइंस्टीन का चेहरा सूरज की भांति दमक उठा.

 

"तुमने देखा," यह कह वे खुशी से उछल पड़े. "तुम संगीत में बहरे नहीं हो."

 

मैंने धीमे से बताया कि यह मेरा एक सबसे प्रिय गीत है और इसे मैं सौ एक बार तो सुन ही चुका हूँ, इसलिए इससे कुछ भी साबित नहीं होता।

 

"बकवास!" वे बोले, "इससे सब कुछ साबित होता है, क्या तुम्हें स्कूल में पढ़ाया गया गणित का पहला पाठ याद है? मान लो संख्याओं से पहली बार वास्ता पड़ते ही तुम्हारी टीचर ने यदि तुम्हें जटिल भाग व घटा की समस्या का हल निकालने के लिए दिया होता तो क्या तुम कर पाते?"

 

उन्होने पाइप को बाहर निकाल फिर मुंह में रख लिया.

 

     स्कूल के पहले दिन कोई भी शिक्षक इस किस्म की मूर्खता नहीं कर सकता. हर किसी को पहले छोटे-छोटे हल निकालने के लिए दिये जाते हैं और सहज समस्याओं पर दक्षता हासिल कर लेने के बाद ही गणित के बड़े-बड़े सवालों के  हल निकालने के लिए कहा जाता हैं.

 

     "संगीत के साथ भी ऐसा ही होता है." आइन्स्टीन ने बिंग क्रोस्बी का रिकॉर्ड उठाया और बोले, "यह सहज और मनभावन गीत साधारण जमा घटा की तरह ही है, तुमने इसमें दक्षता पा ली है. अब हम थोड़े और जटिल संगीत की तरफ बढ़ते हैं."

 

     उन्होंने एक और रिकॉर्ड निकालकर चला दिया. जॉन मैक कौरमक्क की मखमली आवाज पूरे कमरे में गूँजने लगी. कुछ देर बाद आइन्सटाइन ने रिकॉर्ड बंद कर दिया.

 

     "हाँ, तो क्या तुम यह गीत मेरे लिए फिर गाओगे?" 

 

     मैंने बड़े संकोच से गीत गुनगुना शुरू किया, यह देख खुद मैं भी चकित था कि मैं काफी हद तक निभा ले गया. आइन्सटाइन के चेहरे पर जो भाव था वैसा भाव मैंने अपने जीवन में इससे पहले सिर्फ एक बार देखा था: अपने पिता के चेहरे पर जब उच्च स्कूल की शिक्षा पूरी कर लेने के बाद विदाई समारोह में उन्होंने मेरा भाषण सुना था.        

जब मैंने गीत पूरा किया तो आइन्सटाइन बोले, "बहुत खूब, वाकई उम्दा... अब यह !"

 

अब उन्होंने जो गीत चलाया वह मेरे लिए एकदम अनजाना था, पर फिर भी मैंने किसी तरह उस गीत को भी गाकर सुना दिया. आइन्सटाइन ने मुस्कराते हुए सहमति दी.

 

'करुसो' के इस गीत के बाद कम-से-कम दर्जन भर और गीत मुझे सुनाये गए. मैं इस महान शख्सियत के प्रति श्रद्धा से भर उठा, जिनसे मैं इत्तफाक से ही मिला था और मुझे संगीत के गुर सिखाने में वे इस कदर डूब गए थे मानो यही उनकी एकमात्र चिंता हो.    

 

उसके बाद बिना गीत वाले संगीत को सुना, जिनमें शब्द नहीं थे, उस धुन को भी हौले से गुनगुनाने के निर्देश दिये गए. जब मैं उच्च स्वर पर पहुंचा तो   आइन्सटाइन मुंह खोल अपने सिर को एकदम पीछे ले गए ताकि मैं स्वर की उस ऊंचाई तक पहुँच सकूँ जो मुझे मुश्किल लग रहा था, उनकी मदद से मैं काफी हद तक निभा सका और फिर उन्होंने ग्रामोफोन बंद कर दिया.

 

फिर मेरे गले में बाँह डालकर स्नेह से बोले, "प्यारे नौजवान अब हम बाख को सुनने के लिए तैयार हैं."

ड्राइंग रूम में जब हम अपनी कुर्सियों पर लौटे तो संगीतकार नयी धुन शुरू कर रहे थे. आइन्सटाइन मुस्कराए और मेरे घुटने को थपथपाकर मुझे आश्वस्त किया, "बस खुद को संगीत में बहने दो" वे फुसफुसाकर बोले।

यह सब इतना आसान नहीं था. एक नितांत अजनबी के लिए उन्होंने जो मेहनत की थी उसे बयां करना नामुमकिन है? मैं शायद कभी इस तरह संगीत नहीं सुन पाता जैसा अपने जीवन में पहली बार उस रात मैंने बाख को सुना- "Sheep may Safely Graze." उस रात के बाद न जाने कितनी बार मैंने इस संगीत को सुना है.... मुझे नहीं लगता कि मैं कभी भी उसे सुनकर थकूँगा, क्योंकि इसे सुनते वक्‍त मैं कभी अकेला नहीं होता. बेतरतीबी से बिखरे बालों और दांतों के बीच दबे बुझे पाइप वाले एक नाटे, गोल-मटोल व्यक्ति के साथ होता हूँ जिनकी असाधारण स्नेह भरी आँखों में दुनिया का विस्मय झलकता है.    

 

जब संगीत समारोह समाप्त हुआ तो तमाम दूसरे लोगों की तरह मैंने भी  दिल से दाद दी.

 

अचानक हमारी मेजबान से जब हमारा सामना हुआ तो मुझ पर सर्द  निगाह डालते हुए वह बोली, "डॉ. आइन्सटाइन, मुझे खेद है कि संगीत का एक बड़ा हिस्सा आप सुन नहीं पाये.

 

आइन्सटाइन और मैं तुरंत खड़े हो गए. "मुझे भी खेद है." वे बोले, "मेरा यह नौजवान साथी और मैं दरअसल एक ऐसे काम में लगे हुए थे, जिसकी ईश्वर ने हर मनुष्य को काबलियत दी है."

 

"सच" उसके चेहरे पर असमंजस का भाव था, "हाँ तो वह कौन सा काम है?"

 

आइन्सटाइन के चेहरे पर मुस्कराहट खिल उठी और उन्होंने स्नेह से मेरे कंधे में बांह डालकर दस शब्द कहे जो एक शक्स जो ताउम्र उनका ऋणी है, के हृदय पर स्मृति लेख की तरह सदा के लिए अंकित हो गए -

 

" खूबसूरती की सरहद का एक और द्वार खोलने का काम''

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