कला सिनेमा बनाम बाजारू सिनेमा

 

कहा जाता है कि एक विद्या के रूप में सिनेमा नाटक की कोख से ही जन्मा. लेकिन हर नाटक अपनी अगली प्रस्तुति में नया हो जाता है और फिल्म में ऐसा नहीं होता है. नाटक में निर्देशक और अभिनेता की सशरीर जीवित उपस्थिति ही उसे पुनर्नवा बनाए रखती है. फिल्म में निर्देशक और अभिनेता के साथ एक कैमरा भी होता है वह कैमरा ही है जो एक निश्चित दृश्य बंध की सृष्टि के बाद चुपचाप विदा होता है और जाते-जाते अपने दर्शक के लिए निश्चित कोण (दृष्टि) अंतिम रूप से निर्धारित कर चुका होता है. न अटक में नश्वर जीवन होता है और फिल्म में कैमरे की मदद से निर्देशक के द्वारा गढ़ी गयी अनश्वर जीवन छवि. यह अनायास नहीं होता है कि अपनी ही छवि में कैद कई कलाकार बार-बार जीवन में लौटने के लिए छटपटाते हैं.

patherया एक सच्चाई है कि इन छवियों ने हमारे समाज को गहरे अर्थों में प्रभावित किया है.हमारा रहन-सहन, बोल-चाल, रेरती-रिवाज और यहाँ तक कि विश्वासों को भी बदलने में फिल्मों का बड़ा हाथ रहा है. पिछली शताब्दियों की तुलना में बीसवीं शताब्दी में हुए सामाजिक परिवर्तन की अप्रत्याशित तेज गति की कल्पना भी छाया-माया के इस खेल के बिना असम्भव था. लेकिन इस बात को भी कैसे नकारा जा सकता है कि “लुमिएर बन्धुओं” की यह जादुई “लालटेन”, प्रगतिशील कला और परिवर्तनकामी कलाकारों के आभाव में न जाने कब तक टिमटिमा कर बुझ चुकी होती.

भारत में फिल्मों की विकास यात्रा देखें तो इसका पहला युग
1896-1930 तक है. यह मूक सिनेमा का समय था. छोटी-छोटी आकस्मिक गतिविधियों को छोड़ दें तो मूक फिल्मों के निर्माता “दादा साहेब फाल्के” को भारतीय सिनेमा का जनक कहा जाता है. इन्होंने पहली मूक फीचर फिल्म “हरिश्चंद्र बनायीं. यह फिल्म अब उपलब्ध नहीं है.सन 1931में जब बोलती फ़िल्में आर्देशिर इरानी की – “आलम-आरा” और तेलगु में “भक्त प्रहलाद” तथा “तमिल में “कालिदास” बनी तो फिल्मों का दूसरा उत्थान शुरू हो गया, सन 1931 से 1960 तक इस कलारूप का बहुत विकास हुआ. काफी दिनों तक भारतीय भाषाओँ की फ़िल्में आदर्शवाद से उत्प्रेरित होती थीं. धीरे-धीरे यथार्थवाद की ओर झुकाव बढ़ा. मार्क्सवाद का कुछ असर हुआ तो फिल्मों में शोषण-उत्पीडन की पोलें खुलने लगी. साहित्य में जब प्रगतिवाद चरम पर था और इप्टा पूरे देशज में फैल गया था तभी फिल्मों में इस विचारधारा के प्रभाव दिखायी पड़ता है. इप्टा के मँजे  हुए कलाकार फिल्मों में आए थे.वे निर्माता, निर्देह्सक, अभिनेता और गीतकार के रूप में सक्रिय हुए. उल्लेखनीय फ़िल्में इनकी योजनाओं से बनी. मार्क्सवाद के प्रभाव से अलग आधुनिकतावादी मूल्यों से अनुप्रनिता फ़िल्में भी बनायीं जाती थीं. इस दौर की कुछ महत्वपूर्ण फ़िल्में हैं – व्ही. शांताराम – “दुनिया न माने”, “दो आँखें बारह हाथ”,  गुरूदत्त – “प्यासा”, पी.सी. बरूआ – “देवदास”, देवकी बोस – ‘विद्यापति”, फ्रांज आस्टेन – “अछूत कन्या”, महबूब – “औरत”, “आन”, आर्देशिर इरानी – “किसान कन्या”, सोहराब मोदी – “पुकार”, विजय भट्ट – “भरत मिलाप”, “रामराज्य”, बिमलराय – “दो बीघा जमीन”, सत्यजीत राय  - “पथेर पांचाली”, के.ए. अब्बास – “राही”, राजकपूर – “आवारा”, “जागते रहो” आदि हैं. सातवें दशक में जो फ़िल्में मशहूर हुई वे हैं – “मुगल-ए-आजम”, “संगम”, “आरजू”, “साहेब बीबी और गुलाम”. सन 1960 के बाद फिल्म जगत में बहुत परिवर्तन हुआ. पहले से काम कर रहे निर्माताओं ने भी अपना रंग-ढंग और दृष्टिकोण बदला. सरकारी सहयोग के अलावा अन्य वित्त सहयोगी सामने आए. वे जो केवल व्यापारी थे तथा वे भी जिन्हें फिल्मों में रुचि थी और वे अच्छी फिल्मों के धनदाता के रूप में यशकामी थे. इससे अनेक प्रतिभाएं सामने आयीं. बीसवीं शताब्दी के ढलते-ढलते बहुत महंगे वित्तीय ढांचे से फ़िल्में बनने लगीं. बालीवुड दो नंबर के पैसों के खेल का अड्डा बन गया. इस जगत की मुख्य प्रवृति बनी – मंहगी लोकप्रिय फिल्मों का निर्माण. इस तरह यह संसार दो हिस्सों में बंटा – “कला सिनेमा और लोकप्रिय सिनेमा (बाजारू सिनेमा).

moलोकप्रिय सिनेमा के लिए पूंजी का खेल महत्वपूर्ण है. समानांतर सिनेमा, कला सिनेमा और नया सिनेमा में लोकप्रिय सिनेमा से अलग काम करने वालों के समूह थे. ये समूह अभी छोटे बजट और अच्छी फिल्मों के प्रतिज्ञा से बंधे थे. इनका काम भारतीय जीवन के यथार्थ को फिल्मों में में लाना था. जाहिर है पूजी के खेल का मुकाबला “कला सिनेमा” के निर्माता बलपूर्वक नहीं कर सके. फलतः इन्हें खुद अपने में परिवर्तन करना पड़ा. कुछ-कुछ समर्पण और कुछ-कुछ भिन्नता के साथ.सन
1973 में श्याम बेनेगल ने “अंकुर” फिल्म बनायीं तो उसने तहलका मचा दिया. लोकप्रिय सिनेमा की लोकप्रियता चारों खाने चित्त हुई. इस फिल्म ने लोकप्रियता का रिकार्ड बनाया. इसके बाद इन्होंने “निशांत” और “मंथन” जैसी फ़िल्में बनायीं. जिनका कथानक ग्रामीण जीवन से सम्बंधित था. इन फिल्मों के निर्माण से उत्साहित कुछ कला प्रेमी प्रोडयूसर पूंजी लगाने के लिए उत्साहित हुए. महत्वपूर्ण फ़िल्में बनी. जैसे बासु चटर्जी – “सारा आकाश”, “रजनीगंधा”, बासु भट्टाचार्य – “अनुभव”, “अविष्कार”, शिवेंद्र सिन्हा – “फिर भी”, एम. एस. सथ्यू – “गर्म हवा”, अवतार कौल – “27डाउन”, मणि कौल – “आषाढ़ का दिन”, “उसकी रोटी”, “दुविधा”, कुमार साहनी – “माया दर्पण” इत्यादि. इनके अलावा इसी क्रम में नगर-ग्रामों की समस्या, समूह और व्यक्ति के द्वन्द की कथा, भ्रष्टाचार, न्यायिक ढांचे की कमजोरी जैसे विषयों पर – गोविन्द निहलानी – “अर्द्ध सत्य”, सईद मिर्जा – “मोहन जोशी हाजिर हो”, केतन मेहता – “होली”, गोपाल कृष्णन – “मुखामुखम” फ़िल्में बनी. कला फिल्मों का बाजार नष्ट करने के लिए अनेक प्रयास हुए. पूंजी ने दर्शकों को अनेक रास्तों में भटकाने के प्रपंच रचे पर कला फ़िल्में गायब नहीं की जा सकीं. अभी बन रही हैं, चौकाती भी हैं, पर वे हाशिये पर हैं. बालीवुड में ऐसे निर्माता कुछेक हैं. चरित्र अभिनेताओं के संघर्ष टेढ़े हैं. लोकप्रिय सिनेमा ने ऐसे फार्मूले गढ़ें हैं जो युवा पीढी को आकर्षित करें. धर-पकड़ रोमांस के लिए एकांत, पहाड़ नदी-झरने, बरसात, बेडरूम, कैबरे, आदि. इन जगहों में पुरूष-स्त्री अंग प्रदर्शन, विशेष रूप में संभोग चित्रों की भरमार, जासूसी और रहस्य की नकली कथाएं, मृतात्माओं का प्रकट होकर बदला लेना, पुनर्जन्म के प्रसंग पटकथाओं के हिस्से बने. कहानी छोटी-सी होगी और इस तरह के प्रसंगों से ढाई-तीन घंटे की फिल्म बन जायेगी. इस कार्य को अंजाम देनेवाले एक नम्बर के रचनात्मक व्यक्ति कहलाते हैं. ऐसे फार्मूले बन गए जिनके आधार पर छुटभैया प्रतिभाहीन लेखक गीतकार सस्ते रंग भरते हैं. भड़कीले सेटों पर ऐसी फिल्मों की की शूटिंग होती है. इन फिल्मों के नायक, खलनायक-नायिकाओं में प्रेम का उबाल इसी पद्धति से तत्काल अंकुरित होता है. विवाहेतर संबंधों के तनाव और खेल होते हैं. चालाकियां, धूर्तताएँ होती हैं. विवाह पूर नायिकाएं अनेक प्रेम-प्रसंगों से गुजराती हैं और विवाह के बाद भी इनका निर्वाह चलता रहता है. समाज की अन्य समस्याएं दूर-दूर तक नहीं धिख्तीं, संवाद, गीत, संगीत और नृत्य भी फार्मूलों के भीतर होते हैं. एक ज़माने में प्रेमचंद्र, अमृतलाल नागर, मंटो, रेणु, अश्क, राजेंद्र सिंह बेदी, कमलेश्वर, भगवती-चरण शर्मा सिनेमा में पटकथा लिखने के लिए उत्प्रेरित रहते थे, पर धीरे-धीरे कमलेश्वर के अलावा कोई नहीं टिक सका. अंततः कमलेश्वर ने भी माया नगरी छोड़ दी. फ़िल्म का वातावरण यथार्थ विरोधी होता जा रहा है.कलात्मक फ़िल्में इस प्रवृति का प्रतिकार करती थीं. अब तो कला फिल्मों के लिए भी व्यावसायीक शर्तों के सामने झुकना पड़ता है. लोकप्रिय फिल्मों के लिए भी व्यावसायीक शर्तों के सामने झुकना पड़ता है. वस्तुतः लोकप्रिय फ़िल्मों की अन्तर्दशा आज के बाजार का ही विस्तार करती है. फिल्मों के निर्माता पश्चिमी देशों की बाजारू फिल्मों के लगातार संपर्क में रहतें हैं, अंतर्राष्ट्रीय दलाल काम करते हैं. लोकप्रिय कथानक चुराते हैं और वेश बदलकर पेश करते हैं, इन निर्माताओं और धन्दाताओं को हिंदुस्तान की मूलभूत समस्यायों की चिंता नहीं है, बल्कि समाज को बाजार की दौड़ में शामिल होने के लिए तैयार करने का लक्ष्य होता है. इन्हें अन्तर्राष्ट्रीय उधोग घरानों और राजनीती का समर्थन प्राप्त रहता है. लोकप्रिय सिनेमा और फार्मूलों की बढ़ोतरी की प्रतियोगिता के बिच यदा-कदा होशियारी से बनी कला फ़िल्में भी हिट हो जाती हैं. उनमें अग्रगामी मूल्यपरकता होती है. ऐसी फिल्मों का देश कला के लक्षणों से अनुस्यूत होना जरूरी होता है. जो मूल्य दृष्टि तीसरे और चौथे दशक में थी वह आज की नहीं हो सकती. उद्देश्यपूर्ण लेखक, निर्माता और अभिनेता की अंतर्दृष्टि देखने को मिलाती हैं. ये फ़िल्में अपने ही पूर्व सैद्धांतिक आधार का विरोध करते चलती हैं. ये व्यक्ति की आजादी और समजोंमुखता से प्रेरित होती हैं. `लोकप्रिय फ़िल्में सबसे ज्यादा कथानक की करती हैं. इसके बदले विकसित कला फ़िल्में उनका उत्तर होती हैं. इन फिल्मों का उद्देश्य गंभीर दर्शकों के पास जाना है.

कला फिल्मों को धनदाता-निर्माता के अतिनियंत्रण को अस्वीकार करना पड़ता है. उन्हें अभिनेता की विशिष्टता को गंभीरता से रेखांकित करना पड़ता है. जितने अभिनेताओं को कला की दुनिया ने विशेष रूप से पहचाना है, वे कला फिल्मों से ही आए हैं. प्रसिद्ध अभिनेता “नसीरूदीन शाह” अभिनय कौशल के लिए “ब्रेख्त” को याद करते हैं और कहते हैं कि – “अभिनेता दर्शकों के मर्म को स्पर्श करते हैं. चाहें नायक चरित्र हों या खलनायक. दर्शकों के भीतर दोनों का विवेचन हो जाता है.” इन फिल्मों को हिन्दी के महत्वपूर्ण लेखकों की कृतियों से बहुत मदद मिलाती है. “मृणाल सेन” और “मणि कौल” जैसे फिल्मकारों ने साहित्य और सिनेमा को इन्हीं की मदद से करीब किया है. अच्छे मँजे फिल्म अभिनेताओं को तैयार करने में एनएसडी  नई दिल्ली, जामिया मिल्लिया इस्लामिया युनिवर्सिटी  नई दिल्ली, पूना फिल्म संसथान  पुणे, सत्यजित रे फिल्म संसथान  कलकत्ता की अहम् भूमिका है. कला फिल्मों के दर्शक हिन्दी से ज्यादा मलयालम, तेलुगु, तमिल, कन्नड़ और अब वर्तमान में मराठी भाषाओं में हैं.  हिन्दी में यह काम बंगला से आए सत्यजित रे ने जिस खूबी से किया है – अन्य फिल्मकारों ने नहीं किया है. कला फिल्मों के क्षेत्र में फ़िल्में कभी-कभी ऐसी फ़िल्में बनती हैं  जिनकी भाषा दर्शकों के अनुकूल नहीं होती, इस स्थिति में दर्शक निराश होते हैं. वे अपनी विशिष्टता के लोभ में भाषा को उलझाते हैं, फलतः कथानक पारदर्शी नहीं रह जाता. “उत्पल्दत्त” ठीक कहते है कि – “जनता वैसे ही व्यावसायिक फिल्मों का शिकार है, विशिष्टतावादी भी उसे तंग करने लगते हैं. यह शेष हिन्दी सिनेमा में अधिक है. अरविंदन और अडूर गोपाल कृष्णन जय फिल्मकारों से हिन्दी सिनेमा को सीखना चाहिए. असमर्थ और घटिया लेखकों पर निर्भर रहने के बजाए प्रतिभाशाली लेखकों को पटकथा लिखने के लिए आमंत्रित करना चाहिए. जिन निर्देशकों-निर्माताओं ने पटकथा की गुणवत्ता पर ध्यान दिया है उनमें से “श्याम बेनेगल”, “कुमार साहनी”, “मणि कौल”, “सईद मिर्जा”, “सुधीर मिश्रा”,  “प्रकाश झा”, “संजय लीला भंसाली”, “हंसल मेहता”, “अनुराग कश्यप”, “संजय पूरण सिंह”,“सुजीत सरकार” आदि की कोशिशों को सराहना मिली है.

Dabangg-2गौर करने की बात है भारतीय फिल्म को संसार की प्रतियोगिता में ले जाने के लिए प्रायः व्यावसायिक फिल्मों का चयन नहीं होता, अमेरीका की टाइम पत्रिका जब श्रेष्ठ भारतीय फिल्मों का चयन करती है तो “आवारा”, “मदर इंडिया”, “शोले”, “अंकुर”, “चोखेर बाली”, “मकबूल”, “जन अरण्य”, “देवदास” के नाम आते हैं. पिछले दशकों में अमिताभ बच्चन को प्रशंसा तो मिली है पर उन फिल्मों के कारण जो कला फ़िल्में हैं. ऐश्वर्या राय बच्चन परम्परागत मूल्यों को वहन करने वाली भारतीय फिल्मों की नायिका के रूप में चर्चित हुई हैं. आश्चर्य है कि वर्ष 2003 के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में 18 भारतीय फिल्मों के पैनोरमा में 5 मलयाली की और दो हिन्दी की फ़िल्में शामिल थीं. सन  2010 में संजय पूरण सिंह की “लाहौर” जो की नेशनल आवार्ड से नवाजी गई, काफी सराहनीय फिल्म थी. जो संजय की पहली ही फिल्म थी. फिल्मों के विकास और चर्चा में फिल्म प्रचार के काफी महत्व है. आजकल तो ऐसी कंपनियां हैं जो ठेके के पॅकेज के आधार पर काम करती हैं. लोकप्रिय फ़िल्में मर्यादा से बाहर जाती हैं. सेंसर बोर्ड की भूमिका और आचरण पर सवाल उठते हैं. यह बोर्ड निष्पक्ष रह सके तो फिल्म जगत समृद्ध होता है. वहां बाजारू फ़िल्में हैं तो कला फ़िल्में भी.

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