ध्वनियुक्त हिन्दी सिनेमा का आगाज

ध्वनियुक्त हिन्दी सिनेमा सिनेमा का आगाज

Alam Ara1913 में दादा साहेब फालके द्वारा प्रथम कथाचित्र राजा हरिश्चंद्र के प्रदर्शन के बाद पारसी थियेटर से जुड़े हुए तमाम पारसी सेठों, कलाकारों ओर तकनीशियनों का ध्यान इस नयी कलाविधा की ओर गया. 1913 से 1931 के दरमियाँ मदान थियेटर्स, इम्पीरियल, कोहिनूर फिल्म कंपनी, ओरिएण्टल फिल्म कंपनी और महाराष्ट्र फिल्म कंपनी सहित अनेक फिल्म कंपनियों ने 1913 से 1931 के दौरान लगभग 1200 सौ फिल्मों और आठ धारावाहिकों का निर्माण कर डाला. मूक फ़िल्में 1934 तक बनती रहीं. 1934 से ही इनका निर्माण लगभग समाप्त हुआ. इस वर्ष कुल आठ मूक फ़िल्में बनी. 1930 से ही छवि के साथ ध्वनि को जोड़ने की प्रक्रिया आरम्भ हो गई थी. इसमें पहली सफलता इम्पीरियल कंपनी के हाथ लगी.

भारत की पहली सावक (बोलती) फिल्म आलम आरा जिसके निर्माता इम्पीरियल मूविटोने के आर्देशिर इरानी थे, बम्बई के मैजिस्टिक थियेटर में 14 मार्च 1931 को प्रदर्शित हुई थी. आर्देशिर ईरानी हालीवुड के यूनिवर्सल स्टूडियो के भारतीय प्रतिनिधि थे और उनहोंने अब्दुल अली-यूसुफ अली के साथ मिलकर 55 वर्षों तक बम्बई के अलेक्स्जेन्दर सिनेमा का सञ्चालन किया. आर्देशिर ईरानी ने पहली सम्पूर्ण रंगीन फिल्म किसान कन्या का भी निर्माण 1937 में ही किया था. 1934 में उनहोंने अंग्रेजी में नूरजहाँका निर्माण किया था.40 वर्ष की उम्र में अर्देशिर हिंदुस्तान के स्थापित निर्मात-निर्देशक-वितरक एवं फिल्म प्रदर्शक के रूप में अपनी सबसे मत्वपूर्ण जगह बना चुके थे. उन्होंने हिंदी-अंग्रेजी-तमिल-तेलगु के साथ-साथ बर्मीज़, पश्तो आदि भाषाओँ में भी फ़िल्में बनाई. वे मूलतः निर्माता थे. पञ्च मूक फिल्मों और दो सावक फिल्मो का ही उन्होंने निर्देशन किया किन्तु उन्होंने इम्पीरियल फिल्म कंपनी के अंतर्गत लगभग २५० सौ फिल्मो का निर्माण किया. इम्पीरियल ने हिंदी सिनेमा को बिलमोरिया बन्धु, पृथ्वीराज कपूर, याकूब, महबूब खान, मुबारक, सुलोचना जैसे अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व प्रदान किये.

इम्पीरियल फिल्म कंपनी की मदन थियेटर्स के साथ गहरी प्रतिस्पर्धा थी और मदन की पहली फिल्म शीरीं फरहाद, आलम आरा से एक महीने बाद ही प्रदर्शित हुई थी. शीरी फरहाद निश्चित रूप से आलम आरा की तुलन अ में बेहतर निर्माण गुणवता की फिल्म थी, पैर हिंदी फिल्म की पहली फिल्म होने का गौरव तो आलम आरा के हिस्से में ही लिखा था. मुस्लिम पृष्ठभूमि पर आधारित आलम आरा एक वेशभूषा प्रधान फिल्म थी. कमारपुर के बादशाह आदिल सुल्तान की नौबहार और दिलबहार दो बेगुमें थीं. नौबहार नेक और दयालु. इसके उल्ट दिलबहार तेज़-तर्रार और कपटी. बादशाह प्रकट रूप से दोनों को बराबर चाहते. किन्तु दिल ही दिल मै नौबहार उनकी सबसे चहेती थी. सब शुख होते हुए भी बादशाह को कोई संतान नहीं थी. एक फकीर के आशीर्वाद से नौबहार को बीटा होता होता है.नौबहार को बीटा होने पर दिलबहार जलभुन जाती है. वह अपने महत्व को कायम रखने के लिए बदला लेनी की ठानती है. प्रतिशोध के अप्निक योजना के सल्तनत के सिपहसालार को अपनी जवानी के जाल में फंसाकर शामिल करने की कोशिश में असफल होने पर वह उसे बर्बाद कर देती है. जहाँ सिपहसालार को जेल में दल दिया जाता है, वहीँ उसके बीबी और बच्चे राज्य से निकल दिये जातें हैं.

Alamजंगल में भटकते हुए धोखे से शिकारी के एक तीर से सिपहसालार की पत्नी की मौत हो जाती है. उसकी बेटी आलम आरा का लालन-पोषण वाही शिकारी करता है. मरते हुए सिपहसालार की पत्नी शिकारी को सारी कहानी बतला देती है और उससे ये वचन लेती है कि ये बातें उसकी बेटी आलम आरा के बालिग होने पर ही उसे बतलाना. शहजादा और आलम आरा अलग-अलग बड़े होतें और अंत में उनका मिलन होता है. फकीर के हीरे के दिये हीरे के हार को बदलकर शहजादे की जान लेने की साजिश रचनेवाली दिलबहार अपने किये की सजा पाती है और शहजादे और आलम आरा का मिलन होता है.

शहजादा कमर की भूमिका मास्टर विट्ठल और आलम आरा की भूमिका जुबैदा ने की थी. सिपहसालार आदिल का किरदार पृथ्वीराज कपूर ने निभाया था. बादशाह थे एलिजर और उनकी बेगमें नौबहार और दिलबहार बनीं थीं जिल्लोबाई और सुशीला. घुमंतू फ़कीर का किरदार वजीर मुहम्मद खान ने अदा किया था.इनके अतिरिक्त जगदीश सेठी, एल. वी. प्रसाद भी संक्षिप्त भूमिकाओं में थे. नायक की भूमिका जो विट्ठल ने निभाई उसे पहले सुप्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक महबूब खान निभाने वाले थे. महबूब खान ने अपनी शुरूआत इम्पीरियल में सहायक कलाकार के रूप में ही की थी.

आलम आरा पारसी थियेटर्स के लोकप्रिय लेखक जोसफ डेविड के सफल नाटक पर आधारित थी.फिल्म की पटकथा भी खुद डेविड ने ही तैयार की थी.ए. डी. एम इरानी ने छायांकन किया था.सावक फिल्म बनाने के लिए एक विशेष आलेखन उपकरण की आवश्यकता थी. जिसे तनर सिस्टम कहते है. इस मशीन की सब जानकारियां एवं कार्य-पढ़ती का अध्ययन करने के लिए ईरानी स्वयं इंग्लैंड गए और वहां से बाकायदा प्रशिक्षण लेकर लौते थे. जब वे यह विशिष्ट उपकरण लेकर बम्बई पहुंचे तो टाइम्स आफ इंडिया ने इस मशीन को लेकर लेख छापे और उस मशीन की तस्वीर भी डी. इस कैमरे को चालने के लिए ईरानी ने अम्रिकां विल्फोर्ड डेनिम की सेवाएं प्राप्त कीं. उस समय उन्हें इस कम के लिए सौ रूपये प्रतिदिन दिया गया था.

आलम आरा के संगीतकार थे फिरोज श मिस्त्री, आलम आरा में कुल सात गीत थें, जिन्हें उन्हीं अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने गया था जिन पर वे चित्रित किये गए थे. इन सात गानों में सबसे अधिक लोकप्रिय वजीर मुहम्मद खान का गया दे दे खुदा के नाम पर प्यारे, ताकत हो गर देने की.इसमें कोरस का भी प्रयोग किया गया था. इस गीत को हिंदी सिनेमा का पहला गीत होने का सौभाग्य भी मिला और वजीर मुहम्मद को प्रथम गायक होने का.इनके अतिरिक्त अन्य गीत थे – बदला दिवाएगा तू सितमगारों से, रूठा है आसमान गम हो गया माहताब, तेरी कटीली निगाहों ने मारा, दे दिल को आराम आय सकी-ए-गुलफाम. भर-भर के जाम पिलाए जा, और दरस बिना मोरे हैं तरसे नैना प्यारे.

आलम आरा जब बन कर तैयार हुई तो इसका प्रदर्शन भी एक समस्या बनी. इसको दिखने के लिए एक विशेष साउंड प्रोजेक्टर की आवश्यकता थी. इसके लिए अब्दुल अली-यूसुफ अली बंधुओं ने बहुत सहायता की. उनहोंने विदेश से टॉकी प्रोजेक्टर बुलवाया तथा मैजेस्टिक थियेटर को टॉकी थियेटर में बदला गया. तब जा के कहीं आलम आरा नाचती-गाती-बोलती नज़र आई. फिल्म के प्रचार-प्रसार भी उस समय के अनुसार बहुत भव्य ढंग से हुआ था. पुराणी फिटिन घोड़ागाड़ी पर दिढोरोची तीन के भौंपू पर चिल्ला-चिल्लाकर प्रचार करते थे, मुर्दा जिंदा हो गया . . नया अजूबा देखो, चलती-फिरती, नाचती-गाती तस्वीरें चार आने में.

आज आलम आरा की चाँद तस्वीरें और पोस्टर ही शेष हैं.यह अफसोस की बात भी कही जा सकती है कि हिन्दी की पहली फिल्म की कोई स्मृति हम बचाकर नहीं रख सकें. वस्तुतः १९३१ से १९४६ तक बनाई गई अधिकांश फ़िल्में अब नष्ट हो चुकीं हैं. फिल्मों को सुरक्षित रखने का काम आधुनिक तकनीक के आने के तक बड़ा तकलीफदेह और महंगा था. नेशनल फिल्मस आर्कैव्ज में बहुत कम फ़िल्में ही सुरक्षित रखी जा सकी हैं. एक फिल्म आर्काइव ही सभी फिल्मों को सुरक्षीत रख भी नहीं सकता.

आलम आरा से तीन ऐसी शख्सियतें जुडी थीं जिन्होंने आगे चल कर बड़ा नाम कमाया लेकिन आलम आरा मै उनकी भूमिकाएं अत्यंत संक्षिप्त थीं. पहले महबूब खान जो आलम आरा मै हो कर भी नहीं हो सके. दुसरे पृथ्वीराज कपूर, जिन्होंने सिपहसलार की छोटी-सी भूमिका की थी और तीसरे दक्षिण भारत के प्रख्यात निर्माता-निर्देशक एल.वी.प्रसाद, जिन्होंने एक बिल्कुल मामूली भूमिका अदा की थी.

आलम आरा से हिन्दी सिनेमा में जो गीत-संगीत-नृत्य की परम्परा शुरू हुई. वह आजतक बरक़रार है. अधिकांश हिन्दी सिनेमा गीत-संगीत से भरपूर हैं. सिनेमा मै अनेक उपादानों का महत्व घटता-बढता रहा है. लेकिन संगीत का महत्व आदि से लेकर आजतक स्थाई रूप से बरक़रार है.नानूभाई वकील ने आलम आरा का पुनर्निर्माण 1956 और 1973 में किया था.

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