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सिर्फ अपना भला

आज महतो जी बड़े खुश थे, घर पहुँचते ही उन्होंने अपनी पत्नी से कहा, ‘जल्दी से एक कप गरम-गरम चाय बनाकर लाओ और रसगुल्ला भी।‘

‘मिठाई ?’ पत्नी उनका मुँह देख रही थी। आज तक इतना प्रसन्न कभी नहीं दिखे थे। पूछ बैठी ‘रसगुल्ला खाएंगे, तबीयत तो ठीक है। शुगर चेक कराया था क्या ? इतने वर्षों के बाद रसगुल्ला खाने की लालसा कहाँ से जगा कर आ रहें है?’
‘अरे तुम भी सुनोगी तो बाँसों उछल जाओगी।‘ महतो जी ने जोश में कहा। ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें कोई गुप्त धन की प्राप्ति हो गई हो। 
‘फिर भी रसगुल्ला नहीं मिलेगा। खाना है तो रामकली खा लो, कम चीनी डालकर बनाया है, तुम्हें तो बहुत पसन्द है, फिर आज रसगुल्ला क्यों ।‘
महतो ने बड़ी चंचलता से उठे और अपने से नल से पानी निकाला और कुल्ला करते हुए बोले, ‘तुम पूछ नहीं रही हो कि आज मैं इतना प्रसन्न क्यों हूँ।‘ महतो जी गमछा से मुँह साफ करते हुए बोले।
‘अरे पूछना क्या है, प्रमोशन मिलने वाला था, वही मिल गया होगा।‘ पत्नी चाय लाती हुई अपनी शंका जताई।
‘नहीं, नहीं भाग्यवान। एक प्रमोशन नहीं डबल प्रमोशन मिलने वाला काम आज करके आया हूँ।‘
‘तो बताते क्यों नहीं, क्या काम किया है, जरा मैं भी तो जानूँ।’ पत्नी चाय की प्याली महतो जी थमाते हुए बोली, ‘आज कल तुम पहेलियाँ बहुत बुझाने लगे हो। जबसे तेरे विद्यालय में यह नया हेडमास्टर आया है तबसे तुम पगला गए हो। अरे उससे तुमको क्या लेना-देना। वह अपना काम करता है तुम अपना काम करो। तुम इतना उससे जलते क्यों हो। माना कि वह छोटी जाति का है और तुम से उँचा पद पर बैठा है तो क्या हो गया। तुम्हारा आदर तो वह खूब करता है। सुना है उसे कहीं बड़ा पद मिलने वाला है, जब वह चला जाएगा तो निश्चय ही तुम हेडमास्टर बन जाओगे। इतनी जल्दी तो कोई आने से रहा।‘ पत्नी जैसे ही साँस ली, महतो जी बोल पड़े, ‘अरे तुम्ही बक-बक करती रहोगी या मेरी भी कुछ सुनोगी।‘ 
‘तो आपको रोका किसने है। आप तो पहेलियाँ पर पहेलियाँ बुझा रहे हैं। हम तो कम पढ़े लिखे हैं और आप हैं कि इतना पढ़कर भी मास्टरी करते हैं। पढ़ाई का घमण्ड आपको है मुझे नहीं, बकबक भी करने का शौक भी आप ही को है मुझे नहीं।‘ पत्नी थोड़ी नाराज हो गई। चाय की प्याली एक तरफ रखकर सिर आँचल और आगे तक सरकाते हुए पूछी, ‘बताओ, कौन-सा तीर मार कर आये हो?’
‘हाँ...ये हुई न बात.....। बता दूँ, तुम पहले यह बताओ कि आज रसगुल्ला खिलाओगी न ?’
पत्नी ने बड़े रोमांटिक मूड में महतो जी को देखकर कह दिया, ‘हाँ...हाँ ...खिला दूँगी। अब तो बता दो क्या बात है।‘
‘हाँ तो सुनो..... आज हेडमास्टर की सजा हो गयी। वह मेरे रास्ते का काँटा था जो निकल गया। अब मैं हेडमास्टर बन जाउँगा। वह तो अब रहा आने से। उसकी इज्जत को निलाम तो किया ही साथ ही उसके पेट पर भी लात मार दिया। बड़ी हेकड़ी दिखता था स्सा........’
‘बस..बस.. चुप हो जाइये। यह आपने अच्छा नहीं किया.....। अपने स्वार्थ के लिए आप इतना नीचे गिर सकते हैं मैं तो सोच भी नहीं सकती।‘ पत्नी ने अपने माथे को दोनों हाथों से दबाया ....... झूठा इल्जाम, झूठी गवाही...., झूठा सबूत..... सिर्फ अपना भला के लिए, हाय रे मेरा नशीब.......... ।‘ क्योंकि महतो जी आज अपने प्रधान शिक्षक एवं सहकर्मी रामदीन के खिलाफ अदालत में गवाही देकर आये थे और आज ही रामदीन को सरकारी नौकरी से निकाल दिया गया था और साथ ही तीन वर्षों की कैद की सज़ा भी सुनाई गयी थी।


--डॉ. अकेलाभाइ
पो. रिन्जा, शिलांग-793006
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09436117260, 09774286215

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