फैशन और आकांक्षा

दो लघु कथाएँ - प्राण शर्मा f798392c232bca5468984c43a6a4a89c
 
फैशन 
 
       कुछ महीने पहले गाँव से आयी दादी ने दस साल के पोते को अपने पास 
बिठा कर बड़े प्यार से कहा - " तू कितना अच्छा है ! कितना प्यारा है !! हैं न ? "
 
" हाँ , दादी। "
 
" मेरा भोला - भाला और लाडला बच्चा। मेरी एक छोटी सी बात मानेगा ? "
 
" मानूँगा। "
 
" तू मुझे क्या कर पुकारता है ? "
 
" दादी। "
 
" अब से तू मुझे ग्रैंडमम कह कर पुकारा कर। "
 
" वो क्यों , दादी ? " पोते ने जिज्ञासा से पूछा। 
 
" मेरे होनहार बच्चे , ये आजकल का फैशन है। सभी बच्चे अब माँ को मम 
   और  दादी - नानी को ग्रैंडमम कह कर पुकारते हैं। समझ गया  न मेरी बात ? "
 
  पोते  ने बेरुखी से हाँ में गर्दन हिला दी।  
 
                
 
आकांक्षा 
 
 " अरी , क्या हुआ जो वो पैंसठ साल का बूढ़ा खूसठ है , है तो करोड़पति न ?
    एकाध साल में लुढ़क जाएगा। उसकी सारी की सारी संपत्ति की तू ही  तो ---
    तब  ऐश और आराम से रहना। इंग्लैण्ड हो या इंडिया , कौन छैल - छबीला 
    करोड़ों की जायदाद की मालकिन का हाथ माँगने को तैयार नहीं होगा ?
    देखेगी , तुझसे शादी करने के लिए हज़ारों बाँके भागे आएँगे। "
 
    तीस साल की आकांक्षा को माँ का सुझाव बुरा नहीं लगा 
 
    दूसरे दिन ही अग्नि के सात फेरों के बाद वह बूढ़े खूसट की अर्धांगिनी बन गयी। 

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