Hindi Poems

महेंद्र भटनागर की कवितायें

Mahendra-Bhatnagarचाँद मेरे प्यार से 

कौन हो तुम

कौन हो तुम, चिर-प्रतीक्षा-रत

सजग, आधी अँधेरी रात में ?

उड़ रहे हैं घन तिमिर के

सृष्टि के इस छोर से उस छोर तक,

मूक इस वातावरण को

देखते नभ के सितारे एकटक,

                कौन हो तुम, जागतीं जो इन

                सितारों के घने संघात में ?

                कौन हो तुम, चिर-प्रतीक्षा-रत

                सजग, आधी अँधेरी रात में ?

जल रहा यह दीप किसका,

ज्योति अभिनव ले कुटी के द्वार पर,

पंथ पर आलोक अपना

दूर तक बिखरा रहा विस्तार भर,

                कौन है यह दीप ? जलता जो

                अकेला, तीव्र गतिमय वात में ?

                कौन हो तुम, चिर-प्रतीक्षा-रत

                सजग, आधी अँधेरी रात में ?

कर रहा है आज कोई

बार-बार प्रहार मन की बीन पर,

स्नेह काले लोचनों से

युग-कपोलों पर रहा रह-रह बिखर,

                कौन-सी ऐसी व्यथा है,

                रात में जगते हुए जलजात में ?

                कौन हो तुम, चिर-प्रतीक्षा-रत

                सजग, आधी-अँधेरी रात में ?

तुम

सचमुच, तुम कितनी भोली हो !

संकेत तुम्हारे नहीं समझ में आते,

मधु-भाव हृदय के ज्ञात नहीं हो पाते,

        तुम तो अपने में ही डूबी

        नभ-परियों की हमजोली हो !

        सचमुच, तुम कितनी भोली हो !

 तुम एक घड़ी भी ठहर नहीं पाती हो,

फिर भी जाने क्यों मन में बस जाती हो,

        वायु बसंती बन, मंथर-गति

        से जंगल-जंगल डोली हो !

        सचमुच, तुम कितनी भोली हो !

 

जीवन राग से 

जीवन

जीवन राग से 

हर आगत पल का

स्वागत है !

मेरे हाथ पकड़

उठता है दिन,

मेरे कंधों पर चढ़

बढ़ता है दिन,

मेरे मन से

अभिनव रचना

करताहै दिन,

मेरे तन से

सृष्टि नयी

गढ़ता है दिन,

लड़ मेरे बल पर

जीता है दिन,

क्षण-क्षण मेरे जीने पर

जीता है दिन,

मेरी गति से

सार्थक होता काल अमर,

मैं ही हूँ

अविजित अविराम समर,

मेरे सम्मु खहर

पर्वत-बाधा नत है,

हर आगामी कल का

स्वागत है

बाल काव्य से 

वर्षा

   सर-सर करती चले हवा
   पानी बरसे झम-झम-झम !

            आगे-आगे
            गरमी भागे

हँस-हँस गाने  गाएँ हम !
सर-सर करती चले हवा

पानी बरसे झम-झम-झम

           
मेंढ़क बोलें
            पंछी डोलें

बादल  गरजें; जैसे बम !
सर-सर करती चले हवा
पानी बरसे झम-झम-झम !

           
नाव चलाएँ

            खू़ब नहाएँ

 
आओ कूदें धम्मक - धम !
 सर-सर करती  चले हवा
पानी बरसे झम-झम-झम !

     

खेलेंखेल

छुक-छुक करती आयी रेल
आओ, हिल-मिल खेलें खेल !

आँख-मिचौनी, खो-खो और
दौड़ा-भागी सब-सब ठौर !

टिन्नू  मिन्नू  पिन्नू  साथ
हँस-हँस और मिला कर हाथ !

कूदें - फादें  घर दीवार
चाहें  जीतेंचाहें हार !

कसरत करना हमको रोज़
ताक़तवर हो अपनी फ़ौज !

सब कुछ करने को तैयार;
नहीं कभी भी हों बीमार !

 

आपस में हम रक्खें मेल !
छुक-छुक करती आयी रेल
आओ, हिल-मिल खेलें खेल !

मृत्यु-बोध : जीवन-बोध से 

चरैवेति

 संघर्षों-संग्रामों से

    जीवन की निर्मिति,

होना निष्क्रिय

ज्ञापक - आसन्न मरण का,

थमना जीवन की परिणति।

    जीवन: केवल गति,

    अविरति गति !

क्रमशः विकसित होना,

होना परिवर्तित

    जीवन का धारण है !

स्थिरता

प्राण-विहीनों का

    स्थापित लक्षण है !

जीवन में कम्पन है, स्पन्दन है,

जीवन्त उरों में अविरल धड़कन है !

    रुकना

    अस्तित्व - विनाशक

    अशुभ मृत्यु को आमंत्रण,

चलते रहना ... चलते रहना !

एक मात्र मूल-मंत्र

साधक जीवन !

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चाँद मेरे प्यार | बाल काव्य | जीवन राग 1 | जीवन राग 2 | मृत्युबोध- जीवनबोध | रेखा-चित्रा महेंद्र भटनागर  

 

संपर्क 

DR. MAHENDRA BHATNAGAR

Retd. Professor

110, BalwantNagar, Gandhi Road,GWALIOR — 474 002 [M.P.] INDIA

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