Hindi Poems

छूट गया

छूट गया

जीवन की आपाधापी  में,

निकल तो आएं हैं हम,

आगे आगे बहुत आगे,

नए नगर हैं,

नई डगर है,

नए-नए सब राहगीर,

नया-नया कुछ करने की होड़,

जल्दी आगे बढ़ने की दौड़,

माना,

पर छूटे जा रहा,

बेशकीमती अपना

हाय-हायके चक्कर में,

नमस्कारछूट गया,

बा~-बाय करते छूटा प्रणाम।

सड़कों की गर्मी झेली पर,

गलियों की ठंडक छूट गई।

गाँवों से निकले तो,

गाँव की चौपाल छूट गई।

पेन्ट हाऊस में रहते-रहते,

घर के चौबारे छूट गए,

एकाकी कमरों में रहते,

संगी-साथी छूट गए।

कोको-लिम्का पीते-पीते ,

जूस का गिलास छूट गया।

पिट्जा खाने के चक्कर में,

भाखरी-गुड़ छूट गया।

विदेशियों-स्वदेशियों से,

बतियाते- बतियाते,

अपनी भाषा छूट गई।

उनके रंग में रंगते-रंगते,

अपनी संस्कृति छूट गई।

प्लास्टिक को ओढ़्ते-बिछाते,

माटी की गंध छूट गई।

मशीनों के संग रह-रहकर,

आँकड़ों में जी-जीकर,

दिल के अहसास छूट गए।

और बहुत कुछ छूटा है,

यदि झाँके अपने अंदर तो,

निकले नहीं अभी तो दूर,

चलो दौड़कर अपना-अपना

छूटाले आएं।

                       मंजु महिमा

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