मेरे गीत

ग़ज़लें 
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चलता है सब चलता है सब चलता है 
ऐसा कहने से न समाज बदलता है ।
बहता है श्रमजल मज़दूरों का तो 
कुछ का काम बिना ही क़ुनबा पलता है । 
ख़ून पसीना एक किया न मेरा काम बना 
इन का पैसे से काम निकलता है । 
काग़ज़ पर क़लम रगड़ते उम्र बिताई 
क्या जाना किस का नाम सफलता है । 
कब तक दूर दूर रहोगे हम से तुम 
क्या कभी पास आने को जिया मचलता है । 
 
                                       सुधेश 
 
      मुहब्बतें ही यहाँ मुहब्बतें मुहब्बतें 
          ज़िन्दगी की यही हैं  राहतें  राहतें ।
बनाओगे कब तक यों दुनिया  को दोज़ख़ 
चलेंगी कहाँ  तक ये नफरतें नफरतें ।
          उम्र भर आरज़ू का सफ़र चलचलाचल 
           आख़िरी वक़्त भी बची हसरतें हसरतें  ।
उम्र भर पालते ही रहे दुश्मनी को 
मरने के बाद ज़िन्दा रहीं ये चाहतें  ।
            नहीं वक़्त लगता है रुसवाई में तो 
             यहाँ मरने पर ही मिलती  हैं इज़्ज़त्तें  ।
 
                                                           सुधेश 
 
                  उजड़ कर हर एक मेला रह गया 
                          अन्त में दर्शक अकेला रह गया ।
सुखों की चाँदनी में तुम नहा लो 
सीस पर कोई दुपहरी सह गया ।
                           हर शमा के साथ इक परवाना है 
                           मैं ही महफ़िल में अकेला रह गया । 
हँसते हँसते आदमी रोने लगा 
काल आ कर कान में क्या कह गया । 
                          हर किसी के साथ में सारा जहाँ 
                          भीड़ में मैं ही अकेला रह गया ।
हवामहलों से हवा यह कह गई 
एक दिन पुख़्ता क़िला भी ढह गया ।
 
                                                 सुधेश 

 
रोना है तो छुप कर रो 
हँसना हो तो खुल कर हो ।
यदि फूलों का प्रेमी है 
शूलों की खेती मत बो ।
सब की नफ़रत है मरना 
जीना है तो सब का हो ।
मरने पर दुनिया रोये 
मरना तो बस ऐसा हो ।
मन का मैल मिटेगा बस 
आँखों के पानी से धो ।
 
                                            सुधेश 
 
                    मेरे गीत 

            आख़िर जीता प्यार 
 
            ढोता है मन कितनी कुण्ठाओं का भार 
           जीवन रण में मगर न मानेगा वह हार ।
 
तन का बोझ लिये काँधे पर 
चलता जाता है पाँव 
मन का बोझ उठाये मन ही 
फिर भी तो मिले न गाँव ।
            चलना ही जीवन है जीत मिले या हार 
             ढोता है मन                         
 
दुनिया चमक दमक के पीछे 
चाहे हो खोटा स्वर्ण 
जो हैं गुण की खान सदा ही 
जीवन में उन के रुदन ।
            सोने को सहनी पडती सुनार की मार 
             ढोता है मन  
 
मेरा रूप कुरूप न देखो 
सुन लो बस मेरे बोल 
कोयल दुनिया से कहती है 
जंगल जंगल डोल ।
             नफ़रत कभी न जीती आख़िर जीता प्यार 
            ढोता है मन कितनी कुण्ठाओं का भार ।
 
                                                            सुधेश 
 
           पल पल बीत रहा है जीवन 
 
समय निरन्तर चलता रहता 
नयनों के सपनों को छलता 
जीवन घट से रीत रहा ज्यों 
        बूँद बूँद का नश्वर जीवन ।
 
कितना चाहा कितना पाया 
कितना पाया और गँवाया 
हँसते हँसते कह जाता है 
      मौन छलकते आँसू का कन । 
 
हाथ रहे करते धरते कुछ 
पाँव चले गिरते पड़ते कुछ 
पाँव न पहुँचे उस मंज़िल तक 
      मिले हाथ को चार रेत कन ।
 
सपनीली आँखों के सपने 
कितने हो पाये वे अपने 
ठोकर लगते आँख खुली तो 
    बिखर गया फूलों का उपवन ।
 
इच्छाएँ,उड़ती पतंग सी 
कट कर भी जीवित अनंग सी 
कटी पतंगों के पीछे ही 
      दौड़ दौड़ हारा यह जीवन 
       पल पल बीत रहा है जीवन 
                                           सुधेश 
 
     मन भर जाता है 
 
    यह दुनिया हो कितनी सुन्दर 
    इक दिन तो मन भर जाता है । 
 
स्वर्ण छडी अनब्याही लड़की 
मूर्त्ति नहीं है किन्तु रबड़ की 
यह जो नशा जवानी का है 
    देर सवेर उतर जाता है । 
 
बचपन में यौवन के सपने
यौवन में सिन्दूरी सपने 
उन की काली राख देख कर 
    आख़िर में मन मर जाता है ।
 
दूधधुली यह रात चाँदनी 
मदमाती है गन्ध चन्दनी 
कैसा हँसता फूल डाल पर 
      कुछ घण्टों में झर जाता है । 
 
                                      सुधेश 
 
 
           मुहब्बत का चलन 
 
     
 मंज़िल पर पहुँचना चाहता है मन 
 क्या पता कब बैठ जाए तन  ।
ज़िन्दगी तो इक सफ़र से कम नहीं
अनमना चलना पड़ेगा पाँव को ,
राही भटक ले सारे विश्व भर में 
लौट ंआना ही पड़ेगा गाँव को ।
   संकल्प के ऊँचे क़िलों को जीतना है 
    इन हड्डियों में समाये कितनी थकन ।
रोज़ सपने बिन बुलाये अतिथि से 
आ धमकते द्वार पर मेरे सवेरे
उन को टूटना ही था अगर आख़िर
क्यों लगाये मेरे नयन में डेरे ।
    फिर भी देखता रंगीन सपने नित
    क्या पता मन मीत से ंफिर हो मिलन ।
पर्वत  चोटियाँ देखो  बुलाती हैं 
हरी घाटी गूंजती है गीत से 
घृणा के ज्वाला मुखी नित उबलते हैं 
सब  दिलों को  जीतना है प़ीत से  ।
    मेरे ंशब्द करते ऊँची  घोषणा  यह 
    यहाँ होगा फिर मुहब्बत का  चलन  ।
 
                                                           सुधेश    
    
                 कुछ कविताएँ 
 
                
                  दौड़ 
 
सब दौड़ रहे हैं 
क्योकि आजकल यदि मिलता कुछ दौड़ने से मिलता है ।
क्या किसी ने सोचा क्यों दौड़ रहा है 
पूछता किस से कौन 
आगे वाले को देख 
पीछे वाला दौड़ रहा है 
उसे देख उस के पीछे वाला 
बस दौड़ रहा है ।
कोई तो पूछे 
क्या दौड़ना ही लक्ष्य
या कहीं पहुँचना भी है 
पर पूछेगा कौन 
वह भी तो बस दौड़ रहा है ।
 
                            सुधेश 
                 
 
 भाग्य और नियति 
 
मैं भाग्यवादी नहीं 
पर मेरे साथ 
जो अघटित घटा  
या घट रहा है या घटेगा 
है मेरी नियति । 
         भाग्य तो धोखा है 
         हसीन ख़्वाब सा 
         जिसे देखते देखते 
        कई बचपन बुढ़ा गये 
        फिर भी अन्धी आँखों में है 
        आशा की ज्योति । 
घटित और अघटित के बीच 
जीवन बीत रहा 
घड़ी के पैन्डुलम सा । 
 
                     सुधेश 
 
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