मेले में - प्राण शर्मा

मेले में: प्राण शर्मा द्वारा f798392c232bca5468984c43a6a4a89c
 
घर वापस जाने की सुध-बुध बिसराता  है मेले में 
लोगों की रौनक में जो भी रम जाता है मेले में 
 
किसको याद आते हैं घर के दुखड़े , झंझट और झगड़े 
हर कोई खुशियों में खोया मदमाता है मेले में 
 
नीले  -पीले , लाल - गुलाबी पहनावे हैं लोगों के 
इन्द्रधनुष का सागर जैसे लहराता है मेले में 
 
सजी-सजायी  हाट - दुकानें , खेल-तमाशे और झूले
कैसा - कैसा रंग सभी का भरमाता है मेले में 
 
कहीं पकौड़े , कहीं समोसे , कहीं जलेबी की महकें 
मुँह में पानी हर इक के ही भर आता है मेले में 
 
जाने - अनजाने लोगों में फ़र्क़ नहीं दिखता कोई 
जिससे बोलो वो अपनापन दिखलाता है मेले में 
 
डर कर हाथ पकड़ लेती है हर माँ अपने बच्चे का 
ज्यों ही कोई बिछुड़ा बच्चा चिल्लाता है मेले में 
 
ये दुनिया  और दुनियादारी एक तमाशा है भाई 
हर बंजारा भेद जगत के समझाता है मेले में 
 
रब न करे कोई बेचारा मुँह लटकाये घर लौटे 
ज़ेब अपनी कटवाने वाला पछताता है मेले में 
 
राम करे हर गाँव - नगर में मेला नित दिन लगता रहे 
निर्धन और धनी का अंतर  मिट जाता है मेले में 

                                                 प्राण शर्मा 

,क्रैक्स्टन क्लोज़ , 

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