सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है

 'सन्ध्या सिन्दूर लुटाती हैKusum Vir

 

गोधूलि की पद थापों पर

पुष्पों की मूँदी आँखों पर

सरका बदली को चेहरे से
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है

उसकी मनमोहक चितवन से

कई रंग उकेरे सृष्टि ने

हरित धरा पर आभ सुनहरी

मधु स्वप्न संजोए नयनों ने

स्वर्णिम रश्मि की लीकों से

विकीर्ण हुई आभा जिसकी

कौतुहल सा, था विश्व चकित

ज्यों दमकी थी शोभा उसकी

पावस की बूँदें टप - टपकर

गिरती पेड़ों के पत्तों पर

विकल धरा भरती आँजुल

क्षुधा शान्त जन का मन कर

भावों का अप्लव छलक पड़ा

स्वप्निल पूरित नव रागों से

यादों के बादल घुमड़ पड़े

नीरद नयनों की कोरों से

सौंधी माटी की खुशबू से

तनय सुवासित था जिसका

दिन की यादों के साये में

अनुराग सुपुलकित मन उसका

रवि की किरणों संग रास रचा

अब आई प्रणय की वेला है

श्रृंगार सजा, प्रिय भाव लिए
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है
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                 कुसुम वीर

 

 

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