Editor's Choice

मनुस्मृति, वेद और महिला स्वातंत्र्य

मनुस्मृति, वेद और महिला स्वातंत्र्य

women-sufferingवर्तमान समय में बुद्धिजीवियों का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है तो स्त्री विमर्श। हो भी क्यों ना !चाहें ! विषय कोई-सा भी हो उसमें महिलाओं का मुद्दा जोड़ ही दिया जाता है। शिक्षा से लेकर व्यावसाय और राजनीति से लेकर मीडिया एवं सेना तक महिलाओं को आगे लाने और उनके प्रतिनिधित्व को बढाने की बात गम्भीरता से की जा रही है। ये बातें हमारे सामाजिक मानसिकता को दो तथ्यों के तरफ इंगित करती हैं एक सकारात्मक और दूसरा रचनात्मक, इसलिए इनका स्वागत करना चाहिए। परन्तु, इन बातों करने के साथ-साथ एक हीनता का भाव भी भरा जाता है कि आदिकाल में भारत में महिलाओं की स्थिति दैननीय थी और प्राचीन भारतीय शास्त्र विशेषकर मनुस्मृति महिलाओं के अधिकारों और उनके स्वतंत्रता के बड़े विरोधी रहे हैं। कहा और माना जाता है कि प्राचीन भारत में महिलाओं को शिक्षा तक का अधिकार नहीं था, पितृसत्तात्मक समाज होने के कारण। परंतु, सजगता और गम्भीरता से भारतीय शास्त्रों का अध्ययन करने पर स्थिति इसके ठीक विपरीत नज़र आती है। यदि मैं वेदों की बात छोड़ भी दूँ तो भी मनुस्मृति जिस तरह से महिला विरोधी माने जाने वाले ग्रन्थों में महिलाओं के लिए ऐसे विधान किये गए हैं, जो आज भी महिलाओं को प्राप्त नहीं है उसे पाने के लिए महिलाओं को न्यायालयों के शरण में जाना पड़ता है। 

सभी भारतीय विद्वानों का मानना है कि मनु स्मृति वेदों के अनुकूल है। इससे मनु में प्रक्षेपों को पह्चानने और मनु के शुद्ध विधानों का पता लगाना सरल हो जाता है। उदहारण के लिए विधवा-विवाह के सम्बंध में मनु में समर्थन और विरोध दोनों मिलते हैं। तो देखना चाहिए की वेद इस सम्बन्ध में क्या कहते है ? विधवा-विवाह के विषय में ऋगवेद 10/18/8 और अथर्ववेद 18/3/2 में कहा गया है  - हे विधवा नारी, जो चला गया (गुम सो रहा है), इस मृत पति को छोड़ कर उठ, जीवितों के लोक के पति को प्राप्त कर उसी के साथ शेष जीवन बिता। विवाह में जो तेरा हाथ पकड़ा था, उस पति का, तेरा धारण-पोषण करने वाले इस नवीन पति का और तू अपनी इस जन्म दी हुई संतान का ध्यान करके सुख से संयुक्त हो। इससे स्पष्ट हो जाता है की मनु का विधवा-विवाह के बारे में विधान सही है और इसका विरोध करने वाले श्लोक किसी ने बाद में मिलाया है।

इसप्रकार के और भी कई प्रसंग हैं। स्त्रियों का विवाह योग्य वर के साथ ही करना, वरना अविवाहित ही रखना, स्त्री के इच्छा से विवाह किया जाना, नियोग की व्यवस्था आदि सभी के सम्बंध में मनु के साफ निर्देश मिलते हैं। परंतु, वहीं इसके विरोधी श्लोक भी पाए जाते हैं। चूँकि ये व्यवस्था वेदसम्मत भी है, इसलिए विरोधी श्लोकों को प्रक्षिप्त माना जाना चाहिए। प्रक्षिप्त श्लोकों को हटा कर पढ़ने से मनु के सभी विधान काफी उदार और समयोचित सिद्ध होते हैं। मनुस्मृति में प्रक्शिप्तों की बात तो कुल्लूक भट्ट प्रभृति मनु के पुराने भाष्यकार भी स्वीकार करते हैं और उन श्लोकों का प्रक्षिप्त होना प्रोफेसर सुरेंद्र कुमार सहित अनेक विद्वानों ने भली भांति सिद्ध किया है। इन प्रक्षेपों को छोड़ कर ही यहाँ मनु के विधानों की चर्चा की जायेगी। 

मनु ने सर्वत्र महिलाओं को काफी सम्मान दिया है और महिलाओं के प्रसन्न रहने में ही परिवार और कुल की सुख-समृद्धि बताई है। उनका एक प्रसिद्ध वाक्य है जहाँ स्त्रियों का सत्कार और सम्मान होता है, वहां श्रेष्ठ लोगों व देवतावों का वास होता है। इसके आगे वे कहते हैं कि जिस समाज में स्त्रियाँ शोक व चिंताग्रस्त होती हैं, वह समाज शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और जहाँ स्त्रियाँ निश्चिंत और सुखी रहती हैं, वह समाज सदैव विकास करता रहता है। क्या यही कारण है की आज हमारे समाज का पतन हो रहा है, उत्थान नहीं ?

मनु ने आठ प्रकार के विवाहों की चर्चा की है। ये प्रकार स्त्री अधिकारों की रक्षा करते हुए बनाए गए हैं। इन आठ प्रकार के विवाहों को उन्होंने दो भागों में बांटा है उतम और निकृष्ट। ब्रह्मा, दैव, आर्ष और प्रजापत्य उतम विवाह हैं, जिसमें से ब्रह्म विवाह स्पष्ट रूप से प्रेम विवाह है। चार निकृष्ट विवाह में से गंधर्व विवाह तो आज के लिव इनरिलेशन के समान है। मनु ने इसे भी विवाह की संज्ञा दी है यानी कि लिव इन में रहने पर स्त्री को विवाहिता की भांति सरे अधिकार मिलेंगे। 

जब हम नवां अध्याय का अध्ययन करते हैं तो प्रारंभ में ही मनु यह बताते हैं कि स्त्रियाँ ही परिवार, कुल व समाज के सुख का आधार है और इसलिए उनके अधिकारों की रक्षा करना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इसी अध्याय में स्त्री के स्वयं से वर चुनने यानी कि प्रेम विवाह को कानूनी वैधता भी देते हैं। मनु ने विधवा-विवाह को भी इसी अध्याय में मान्यता दी है। वे कहते है कि यदि महिला के विवाह (वाग्दान) हो जाने के बाद उसके पति की मृत्यु हो जाये तो उसका दूसरा विवाह कर दिया जाना चाहिए। इसी अध्याय में महिलाओं के लिए नियोग करने के अधिकार भी चर्चा की है। नियोग यानी कि महिला को यह अधिकार होता है कि पति के आभाव में वह किसी अन्य पुरूष से संतान उत्पन्न कर सकती थी। नियोग का यह विधान बताता है कि प्राचीन भारतीय समाज में स्त्रियों को किस हद तक स्वाधीनता दी गई थी। आज एक ओर जहाँ पुरूषों को यह छूट दी जाती कि संतान न होने पे दूसरा विवाह कर ले, मनु ने महिलाओं को यह छूट दी है कि यदि पति से संतान न हो रही हो तो वह दुसरे से संतान उत्पन्न कर ले। इस विधान में आज की सरोगेट माँ को भी देखा जा सकता है। संतान उत्पन्न होने के बाद, उससे सम्बंध समाप्त करने होते थे। इससे साफ है कि नियोग करने वाली महिलाओं की भी पूरी प्रतिष्ठा होती थी। 

इसप्रकार हम पाते है कि मनुस्मृति में महिलाओं के अधिकारों को पूरा-पूरा स्थान दिया गया है। हालांकि मनु में इन सकारात्मक विधानों के साथ ही इनके विरोधी विधान मिला दिए गए हैं। परंतु, इन विधानों के आलोक में यदि हम मनुस्मृति को पढेंगे तो इन प्रक्षेपों को समझ पाएंगे। कहा जा सकत है कि यदि मनु के वास्तविक विचारों को प्रक्षेपों से और पूर्वाग्रहों से मुक्त हो कर समझने का प्रयास किया जाये तो समाज में न केवल महिलाओं को उनका उचित स्थान मिल सकेगा, बल्कि हम यह भी गर्वपूर्वक कह पाएंगे कि प्राचीन भारत का समाज एक अति उदार और विकसित समाज था।

Search