Warning: implode(): Invalid arguments passed in /home/hindice/public_html/libraries/src/Router/SiteRouter.php on line 442
All articles of Author: Newton Mishra

Warning: First parameter must either be an object or the name of an existing class in /home/hindice/public_html/libraries/windwalker/src/View/Html/ItemHtmlView.php on line 60

भारत-इजराइल संबंधों में गर्म-जोशी की आहट!

 
 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इजरायल यात्रा, भारत-इजराइल संबंधों में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। वो भी अब जब इजराइल में नेतान्याहू के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हो चुका है इस दौरे से जहाँ द्विपक्षीय रिश्ते को एक नए आयाम मिलेंगे, वहीं यह यात्रा हमारे बीच के गहरे और मजबूत सहयोग संबंधों के सभी पहलुओं को अपने में समेटे हुए होगी। पिछले महीने भारत में इजराइल के राजदूत डेनियल कारमोन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा को लेकर कहा कि उनकी यह यात्रा ऐतिहासिक और यादगार होगी।  

India-Israel

ऐसे में अब यह यात्रा भारत-इजरायल संबंधों में सामरिक दृष्टिकोण से बहुत खास हो गया है कि किन-किन मुद्दों पे दोनों देशों के बीच आपसी सहमती के बाद समझौता होता है? यह यात्रा इसलिए भी खास है क्यूंकि जब हम पीछे की ओर पीछे मुड़कर देखें तोविगत कुछ वर्षों में हमने भारत से इजरायल की यात्रा करने वालों की अधिक संख्या नहीं देखी है, सिर्फ साल 2012 में तत्कालिन विदेश मंत्री एस.एम. कृष्णा को छोड़कर। अगर हम एक दशक और उससे अधिक पीछे मुड़कर देखें तो हमने ऐसी अधिक यात्राएं नहीं की हैं। इस बाबत पिछले साल न्यूयार्क में हुई दोनों देशों के मंत्रियों की मुलाकात के दौरान बातचीत हुई थी। यहां तक कि भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की यात्रा के लिए जनवरी 2015 की तारीख भी तय हो गई थी, लेकिन इजराइल में चुनाव प्रस्तावित होने की वजह से इस यात्रा को उस समय के लिए रद्द करना पड़ा था।

बात प्रधानमंत्री के दौरे की हो तो यह मसला और भी खास हो जाता है क्यूंकि सामान्य तौर पर हम अपने अधिकतर रिश्तों में रक्षा मसलों को ही प्रमुखता देते आए हैं। रक्षा संबंधित मसला महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन यह आपसी रिश्ते का एक हिस्सा है ना की भावनात्मक रिश्ते का। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बीते एक साल में अपने रिकॉर्ड तोड़ विदेशी दौरों भावनात्मक रिश्ते में “मेक इन इंडिया” के सहारे मजबूती पे जोर दिया है जिससे एक साल के अंतर्गत “ब्रांड इंडिया” में चमक आई है। इस भावनात्मक रिश्ते का ही परिणाम था कि जहां पूरी दुनिया 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में सेलिब्रेट करने पे आम सहमत होकर, पहली बार सेलिब्रेट किया वहीं इजरायल की टीम भी इस अवसर में अपनी भागीदारी देकर गर्व महसूस कर रहा है। एक और भावनात्मक रिश्ता है, जो कि प्राचीन परंपराओं और धर्मों का दुनिया भर में पड़ने वाले बड़े प्रभाव की वजह से है। अगर हम हितों पर नजर डालें तो हम मूल्यों और चुनौतियों को लेकर उत्साहित होते हैं और उसे साझा करते हैं। इतना ही नहीं, हम इस बाबत एक-दूसरे का आदर भी करते हैं। हालांकि, यह काफी नहीं है। हम अभी भी मुख्य रूप से सिर्फ पश्चिमी देशों के साथ काम कर रहे हैं। अभी एक इजरायली उद्यमी या उच्च तकनीकी का अन्वेषक यूएस, कनाडा और आस्ट्रेलिया के बारे में सोचता है, न कि भारत के बारे में। इसमें बदलाव आना चाहिए।

माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी के दौरे के दौरान एक समझौते पर हस्ताक्षर होगा और साथ में हरिद्वार को यरुशलम की तरह विकसीत करने को लेकर सहमती बने और एक-दुसरे की सभ्यता-संस्कृति के आदान-प्रदान के समझौता होगा। उस दौरान प्रधानमंत्री मोदी हाई टेक्नॉलजी के प्लांट्स, यूनिवर्सिटी आदि का दौरा करेंगे जो कि नौकरशाही के लिए एक संकेत होगा और दोनों देशों के लोगों के संबंधों में सकारात्मक बदलाव आएगा। इससे भारत और इजरायल के ऐसे लोग जो कि इस संशय में हैं कि क्या दोनों देश एक साथ काम करेंगे, दो नेताओं की राजनीतिक इच्छाशक्ति को देखेंगे।

भारत-इजराइल के पिछले एक साल के अंतर्गत  द्विपक्षीय रिश्ते का ही परिणाम है कि नेगेव मरुस्थल स्थित बेन गुरियन यूनिवर्सिटी के प्रयोगशाला के प्रोफेसर आमिर सागी के द्वारा इजाद किया हुआ प्रौद्योगिकी जो मीठे पानी की झींगा मछली के उत्पादन में इजाफा करता है। जिसे मैरिन प्रॉडक्ट्स एक्सपोर्ट डिवेलपमेंट अथॉरिटी (एमपीईडीए) प्रोफेसर सागी के साथ मिलकर इस प्रौद्योगिकी को भारत में झींगा का उत्पादन करने वाले राज्यों के मछली उत्पादकों के बीच लाने की तैयारी कर रही है। जिससे भारत के केरल स्थित मीठे पानी की झीलों में झींगा मछली का उत्पादन करने वाले किसानों की आमदनी में इजाफा होगा। यही तक नहीं, इजरायली विशेषज्ञों ने फसलों की पैदावार उन्नत करने और सिंचाई के लिए जल संरक्षण संबंधित अपने तकनीकी अनुभव को भारतीय किसानों के साथ साझा करने का एक प्रस्ताव भी दिया है। यह संकेत भारत-इजराइल के बीच जानकारियों और तकनीकियों को परस्पर साझा करने की ओर इशारा मात्र नहीं है. यह एक दोनों देशों के बीच परस्पर आपसी सहयोग और भाईचारे के तरफ भविष्य की ओर बढ़ते कदम-ताल के शुभ संकेत है जिसे प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री के आगामी इजराइल दौरे से रफ्तार मिलेगा। यह रफ्तार को कायम रखने में सबसे अहम् भूमिका अदा करेगा मोदी सरकार का महत्वाकांक्षी अभियान “मेक इन इंडिया” और “डिजिटल इंडिया”।

Read more: भारत-इजराइल संबंधों में गर्म-जोशी की आहट!

मनुस्मृति, वेद और महिला स्वातंत्र्य

मनुस्मृति, वेद और महिला स्वातंत्र्य

women-sufferingवर्तमान समय में बुद्धिजीवियों का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है तो स्त्री विमर्श। हो भी क्यों ना !चाहें ! विषय कोई-सा भी हो उसमें महिलाओं का मुद्दा जोड़ ही दिया जाता है। शिक्षा से लेकर व्यावसाय और राजनीति से लेकर मीडिया एवं सेना तक महिलाओं को आगे लाने और उनके प्रतिनिधित्व को बढाने की बात गम्भीरता से की जा रही है। ये बातें हमारे सामाजिक मानसिकता को दो तथ्यों के तरफ इंगित करती हैं एक सकारात्मक और दूसरा रचनात्मक, इसलिए इनका स्वागत करना चाहिए। परन्तु, इन बातों करने के साथ-साथ एक हीनता का भाव भी भरा जाता है कि आदिकाल में भारत में महिलाओं की स्थिति दैननीय थी और प्राचीन भारतीय शास्त्र विशेषकर मनुस्मृति महिलाओं के अधिकारों और उनके स्वतंत्रता के बड़े विरोधी रहे हैं। कहा और माना जाता है कि प्राचीन भारत में महिलाओं को शिक्षा तक का अधिकार नहीं था, पितृसत्तात्मक समाज होने के कारण। परंतु, सजगता और गम्भीरता से भारतीय शास्त्रों का अध्ययन करने पर स्थिति इसके ठीक विपरीत नज़र आती है। यदि मैं वेदों की बात छोड़ भी दूँ तो भी मनुस्मृति जिस तरह से महिला विरोधी माने जाने वाले ग्रन्थों में महिलाओं के लिए ऐसे विधान किये गए हैं, जो आज भी महिलाओं को प्राप्त नहीं है उसे पाने के लिए महिलाओं को न्यायालयों के शरण में जाना पड़ता है। 

सभी भारतीय विद्वानों का मानना है कि मनु स्मृति वेदों के अनुकूल है। इससे मनु में प्रक्षेपों को पह्चानने और मनु के शुद्ध विधानों का पता लगाना सरल हो जाता है। उदहारण के लिए विधवा-विवाह के सम्बंध में मनु में समर्थन और विरोध दोनों मिलते हैं। तो देखना चाहिए की वेद इस सम्बन्ध में क्या कहते है ? विधवा-विवाह के विषय में ऋगवेद 10/18/8 और अथर्ववेद 18/3/2 में कहा गया है  - हे विधवा नारी, जो चला गया (गुम सो रहा है), इस मृत पति को छोड़ कर उठ, जीवितों के लोक के पति को प्राप्त कर उसी के साथ शेष जीवन बिता। विवाह में जो तेरा हाथ पकड़ा था, उस पति का, तेरा धारण-पोषण करने वाले इस नवीन पति का और तू अपनी इस जन्म दी हुई संतान का ध्यान करके सुख से संयुक्त हो। इससे स्पष्ट हो जाता है की मनु का विधवा-विवाह के बारे में विधान सही है और इसका विरोध करने वाले श्लोक किसी ने बाद में मिलाया है।

इसप्रकार के और भी कई प्रसंग हैं। स्त्रियों का विवाह योग्य वर के साथ ही करना, वरना अविवाहित ही रखना, स्त्री के इच्छा से विवाह किया जाना, नियोग की व्यवस्था आदि सभी के सम्बंध में मनु के साफ निर्देश मिलते हैं। परंतु, वहीं इसके विरोधी श्लोक भी पाए जाते हैं। चूँकि ये व्यवस्था वेदसम्मत भी है, इसलिए विरोधी श्लोकों को प्रक्षिप्त माना जाना चाहिए। प्रक्षिप्त श्लोकों को हटा कर पढ़ने से मनु के सभी विधान काफी उदार और समयोचित सिद्ध होते हैं। मनुस्मृति में प्रक्शिप्तों की बात तो कुल्लूक भट्ट प्रभृति मनु के पुराने भाष्यकार भी स्वीकार करते हैं और उन श्लोकों का प्रक्षिप्त होना प्रोफेसर सुरेंद्र कुमार सहित अनेक विद्वानों ने भली भांति सिद्ध किया है। इन प्रक्षेपों को छोड़ कर ही यहाँ मनु के विधानों की चर्चा की जायेगी। 

मनु ने सर्वत्र महिलाओं को काफी सम्मान दिया है और महिलाओं के प्रसन्न रहने में ही परिवार और कुल की सुख-समृद्धि बताई है। उनका एक प्रसिद्ध वाक्य है जहाँ स्त्रियों का सत्कार और सम्मान होता है, वहां श्रेष्ठ लोगों व देवतावों का वास होता है। इसके आगे वे कहते हैं कि जिस समाज में स्त्रियाँ शोक व चिंताग्रस्त होती हैं, वह समाज शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और जहाँ स्त्रियाँ निश्चिंत और सुखी रहती हैं, वह समाज सदैव विकास करता रहता है। क्या यही कारण है की आज हमारे समाज का पतन हो रहा है, उत्थान नहीं ?

मनु ने आठ प्रकार के विवाहों की चर्चा की है। ये प्रकार स्त्री अधिकारों की रक्षा करते हुए बनाए गए हैं। इन आठ प्रकार के विवाहों को उन्होंने दो भागों में बांटा है उतम और निकृष्ट। ब्रह्मा, दैव, आर्ष और प्रजापत्य उतम विवाह हैं, जिसमें से ब्रह्म विवाह स्पष्ट रूप से प्रेम विवाह है। चार निकृष्ट विवाह में से गंधर्व विवाह तो आज के लिव इनरिलेशन के समान है। मनु ने इसे भी विवाह की संज्ञा दी है यानी कि लिव इन में रहने पर स्त्री को विवाहिता की भांति सरे अधिकार मिलेंगे। 

जब हम नवां अध्याय का अध्ययन करते हैं तो प्रारंभ में ही मनु यह बताते हैं कि स्त्रियाँ ही परिवार, कुल व समाज के सुख का आधार है और इसलिए उनके अधिकारों की रक्षा करना सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। इसी अध्याय में स्त्री के स्वयं से वर चुनने यानी कि प्रेम विवाह को कानूनी वैधता भी देते हैं। मनु ने विधवा-विवाह को भी इसी अध्याय में मान्यता दी है। वे कहते है कि यदि महिला के विवाह (वाग्दान) हो जाने के बाद उसके पति की मृत्यु हो जाये तो उसका दूसरा विवाह कर दिया जाना चाहिए। इसी अध्याय में महिलाओं के लिए नियोग करने के अधिकार भी चर्चा की है। नियोग यानी कि महिला को यह अधिकार होता है कि पति के आभाव में वह किसी अन्य पुरूष से संतान उत्पन्न कर सकती थी। नियोग का यह विधान बताता है कि प्राचीन भारतीय समाज में स्त्रियों को किस हद तक स्वाधीनता दी गई थी। आज एक ओर जहाँ पुरूषों को यह छूट दी जाती कि संतान न होने पे दूसरा विवाह कर ले, मनु ने महिलाओं को यह छूट दी है कि यदि पति से संतान न हो रही हो तो वह दुसरे से संतान उत्पन्न कर ले। इस विधान में आज की सरोगेट माँ को भी देखा जा सकता है। संतान उत्पन्न होने के बाद, उससे सम्बंध समाप्त करने होते थे। इससे साफ है कि नियोग करने वाली महिलाओं की भी पूरी प्रतिष्ठा होती थी। 

इसप्रकार हम पाते है कि मनुस्मृति में महिलाओं के अधिकारों को पूरा-पूरा स्थान दिया गया है। हालांकि मनु में इन सकारात्मक विधानों के साथ ही इनके विरोधी विधान मिला दिए गए हैं। परंतु, इन विधानों के आलोक में यदि हम मनुस्मृति को पढेंगे तो इन प्रक्षेपों को समझ पाएंगे। कहा जा सकत है कि यदि मनु के वास्तविक विचारों को प्रक्षेपों से और पूर्वाग्रहों से मुक्त हो कर समझने का प्रयास किया जाये तो समाज में न केवल महिलाओं को उनका उचित स्थान मिल सकेगा, बल्कि हम यह भी गर्वपूर्वक कह पाएंगे कि प्राचीन भारत का समाज एक अति उदार और विकसित समाज था।

Read more: मनुस्मृति, वेद और महिला स्वातंत्र्य

कला सिनेमा बनाम बाजारू सिनेमा

 

कहा जाता है कि एक विद्या के रूप में सिनेमा नाटक की कोख से ही जन्मा. लेकिन हर नाटक अपनी अगली प्रस्तुति में नया हो जाता है और फिल्म में ऐसा नहीं होता है. नाटक में निर्देशक और अभिनेता की सशरीर जीवित उपस्थिति ही उसे पुनर्नवा बनाए रखती है. फिल्म में निर्देशक और अभिनेता के साथ एक कैमरा भी होता है वह कैमरा ही है जो एक निश्चित दृश्य बंध की सृष्टि के बाद चुपचाप विदा होता है और जाते-जाते अपने दर्शक के लिए निश्चित कोण (दृष्टि) अंतिम रूप से निर्धारित कर चुका होता है. न अटक में नश्वर जीवन होता है और फिल्म में कैमरे की मदद से निर्देशक के द्वारा गढ़ी गयी अनश्वर जीवन छवि. यह अनायास नहीं होता है कि अपनी ही छवि में कैद कई कलाकार बार-बार जीवन में लौटने के लिए छटपटाते हैं.

patherया एक सच्चाई है कि इन छवियों ने हमारे समाज को गहरे अर्थों में प्रभावित किया है.हमारा रहन-सहन, बोल-चाल, रेरती-रिवाज और यहाँ तक कि विश्वासों को भी बदलने में फिल्मों का बड़ा हाथ रहा है. पिछली शताब्दियों की तुलना में बीसवीं शताब्दी में हुए सामाजिक परिवर्तन की अप्रत्याशित तेज गति की कल्पना भी छाया-माया के इस खेल के बिना असम्भव था. लेकिन इस बात को भी कैसे नकारा जा सकता है कि “लुमिएर बन्धुओं” की यह जादुई “लालटेन”, प्रगतिशील कला और परिवर्तनकामी कलाकारों के आभाव में न जाने कब तक टिमटिमा कर बुझ चुकी होती.

भारत में फिल्मों की विकास यात्रा देखें तो इसका पहला युग
1896-1930 तक है. यह मूक सिनेमा का समय था. छोटी-छोटी आकस्मिक गतिविधियों को छोड़ दें तो मूक फिल्मों के निर्माता “दादा साहेब फाल्के” को भारतीय सिनेमा का जनक कहा जाता है. इन्होंने पहली मूक फीचर फिल्म “हरिश्चंद्र बनायीं. यह फिल्म अब उपलब्ध नहीं है.सन 1931में जब बोलती फ़िल्में आर्देशिर इरानी की – “आलम-आरा” और तेलगु में “भक्त प्रहलाद” तथा “तमिल में “कालिदास” बनी तो फिल्मों का दूसरा उत्थान शुरू हो गया, सन 1931 से 1960 तक इस कलारूप का बहुत विकास हुआ. काफी दिनों तक भारतीय भाषाओँ की फ़िल्में आदर्शवाद से उत्प्रेरित होती थीं. धीरे-धीरे यथार्थवाद की ओर झुकाव बढ़ा. मार्क्सवाद का कुछ असर हुआ तो फिल्मों में शोषण-उत्पीडन की पोलें खुलने लगी. साहित्य में जब प्रगतिवाद चरम पर था और इप्टा पूरे देशज में फैल गया था तभी फिल्मों में इस विचारधारा के प्रभाव दिखायी पड़ता है. इप्टा के मँजे  हुए कलाकार फिल्मों में आए थे.वे निर्माता, निर्देह्सक, अभिनेता और गीतकार के रूप में सक्रिय हुए. उल्लेखनीय फ़िल्में इनकी योजनाओं से बनी. मार्क्सवाद के प्रभाव से अलग आधुनिकतावादी मूल्यों से अनुप्रनिता फ़िल्में भी बनायीं जाती थीं. इस दौर की कुछ महत्वपूर्ण फ़िल्में हैं – व्ही. शांताराम – “दुनिया न माने”, “दो आँखें बारह हाथ”,  गुरूदत्त – “प्यासा”, पी.सी. बरूआ – “देवदास”, देवकी बोस – ‘विद्यापति”, फ्रांज आस्टेन – “अछूत कन्या”, महबूब – “औरत”, “आन”, आर्देशिर इरानी – “किसान कन्या”, सोहराब मोदी – “पुकार”, विजय भट्ट – “भरत मिलाप”, “रामराज्य”, बिमलराय – “दो बीघा जमीन”, सत्यजीत राय  - “पथेर पांचाली”, के.ए. अब्बास – “राही”, राजकपूर – “आवारा”, “जागते रहो” आदि हैं. सातवें दशक में जो फ़िल्में मशहूर हुई वे हैं – “मुगल-ए-आजम”, “संगम”, “आरजू”, “साहेब बीबी और गुलाम”. सन 1960 के बाद फिल्म जगत में बहुत परिवर्तन हुआ. पहले से काम कर रहे निर्माताओं ने भी अपना रंग-ढंग और दृष्टिकोण बदला. सरकारी सहयोग के अलावा अन्य वित्त सहयोगी सामने आए. वे जो केवल व्यापारी थे तथा वे भी जिन्हें फिल्मों में रुचि थी और वे अच्छी फिल्मों के धनदाता के रूप में यशकामी थे. इससे अनेक प्रतिभाएं सामने आयीं. बीसवीं शताब्दी के ढलते-ढलते बहुत महंगे वित्तीय ढांचे से फ़िल्में बनने लगीं. बालीवुड दो नंबर के पैसों के खेल का अड्डा बन गया. इस जगत की मुख्य प्रवृति बनी – मंहगी लोकप्रिय फिल्मों का निर्माण. इस तरह यह संसार दो हिस्सों में बंटा – “कला सिनेमा और लोकप्रिय सिनेमा (बाजारू सिनेमा).

moलोकप्रिय सिनेमा के लिए पूंजी का खेल महत्वपूर्ण है. समानांतर सिनेमा, कला सिनेमा और नया सिनेमा में लोकप्रिय सिनेमा से अलग काम करने वालों के समूह थे. ये समूह अभी छोटे बजट और अच्छी फिल्मों के प्रतिज्ञा से बंधे थे. इनका काम भारतीय जीवन के यथार्थ को फिल्मों में में लाना था. जाहिर है पूजी के खेल का मुकाबला “कला सिनेमा” के निर्माता बलपूर्वक नहीं कर सके. फलतः इन्हें खुद अपने में परिवर्तन करना पड़ा. कुछ-कुछ समर्पण और कुछ-कुछ भिन्नता के साथ.सन
1973 में श्याम बेनेगल ने “अंकुर” फिल्म बनायीं तो उसने तहलका मचा दिया. लोकप्रिय सिनेमा की लोकप्रियता चारों खाने चित्त हुई. इस फिल्म ने लोकप्रियता का रिकार्ड बनाया. इसके बाद इन्होंने “निशांत” और “मंथन” जैसी फ़िल्में बनायीं. जिनका कथानक ग्रामीण जीवन से सम्बंधित था. इन फिल्मों के निर्माण से उत्साहित कुछ कला प्रेमी प्रोडयूसर पूंजी लगाने के लिए उत्साहित हुए. महत्वपूर्ण फ़िल्में बनी. जैसे बासु चटर्जी – “सारा आकाश”, “रजनीगंधा”, बासु भट्टाचार्य – “अनुभव”, “अविष्कार”, शिवेंद्र सिन्हा – “फिर भी”, एम. एस. सथ्यू – “गर्म हवा”, अवतार कौल – “27डाउन”, मणि कौल – “आषाढ़ का दिन”, “उसकी रोटी”, “दुविधा”, कुमार साहनी – “माया दर्पण” इत्यादि. इनके अलावा इसी क्रम में नगर-ग्रामों की समस्या, समूह और व्यक्ति के द्वन्द की कथा, भ्रष्टाचार, न्यायिक ढांचे की कमजोरी जैसे विषयों पर – गोविन्द निहलानी – “अर्द्ध सत्य”, सईद मिर्जा – “मोहन जोशी हाजिर हो”, केतन मेहता – “होली”, गोपाल कृष्णन – “मुखामुखम” फ़िल्में बनी. कला फिल्मों का बाजार नष्ट करने के लिए अनेक प्रयास हुए. पूंजी ने दर्शकों को अनेक रास्तों में भटकाने के प्रपंच रचे पर कला फ़िल्में गायब नहीं की जा सकीं. अभी बन रही हैं, चौकाती भी हैं, पर वे हाशिये पर हैं. बालीवुड में ऐसे निर्माता कुछेक हैं. चरित्र अभिनेताओं के संघर्ष टेढ़े हैं. लोकप्रिय सिनेमा ने ऐसे फार्मूले गढ़ें हैं जो युवा पीढी को आकर्षित करें. धर-पकड़ रोमांस के लिए एकांत, पहाड़ नदी-झरने, बरसात, बेडरूम, कैबरे, आदि. इन जगहों में पुरूष-स्त्री अंग प्रदर्शन, विशेष रूप में संभोग चित्रों की भरमार, जासूसी और रहस्य की नकली कथाएं, मृतात्माओं का प्रकट होकर बदला लेना, पुनर्जन्म के प्रसंग पटकथाओं के हिस्से बने. कहानी छोटी-सी होगी और इस तरह के प्रसंगों से ढाई-तीन घंटे की फिल्म बन जायेगी. इस कार्य को अंजाम देनेवाले एक नम्बर के रचनात्मक व्यक्ति कहलाते हैं. ऐसे फार्मूले बन गए जिनके आधार पर छुटभैया प्रतिभाहीन लेखक गीतकार सस्ते रंग भरते हैं. भड़कीले सेटों पर ऐसी फिल्मों की की शूटिंग होती है. इन फिल्मों के नायक, खलनायक-नायिकाओं में प्रेम का उबाल इसी पद्धति से तत्काल अंकुरित होता है. विवाहेतर संबंधों के तनाव और खेल होते हैं. चालाकियां, धूर्तताएँ होती हैं. विवाह पूर नायिकाएं अनेक प्रेम-प्रसंगों से गुजराती हैं और विवाह के बाद भी इनका निर्वाह चलता रहता है. समाज की अन्य समस्याएं दूर-दूर तक नहीं धिख्तीं, संवाद, गीत, संगीत और नृत्य भी फार्मूलों के भीतर होते हैं. एक ज़माने में प्रेमचंद्र, अमृतलाल नागर, मंटो, रेणु, अश्क, राजेंद्र सिंह बेदी, कमलेश्वर, भगवती-चरण शर्मा सिनेमा में पटकथा लिखने के लिए उत्प्रेरित रहते थे, पर धीरे-धीरे कमलेश्वर के अलावा कोई नहीं टिक सका. अंततः कमलेश्वर ने भी माया नगरी छोड़ दी. फ़िल्म का वातावरण यथार्थ विरोधी होता जा रहा है.कलात्मक फ़िल्में इस प्रवृति का प्रतिकार करती थीं. अब तो कला फिल्मों के लिए भी व्यावसायीक शर्तों के सामने झुकना पड़ता है. लोकप्रिय फिल्मों के लिए भी व्यावसायीक शर्तों के सामने झुकना पड़ता है. वस्तुतः लोकप्रिय फ़िल्मों की अन्तर्दशा आज के बाजार का ही विस्तार करती है. फिल्मों के निर्माता पश्चिमी देशों की बाजारू फिल्मों के लगातार संपर्क में रहतें हैं, अंतर्राष्ट्रीय दलाल काम करते हैं. लोकप्रिय कथानक चुराते हैं और वेश बदलकर पेश करते हैं, इन निर्माताओं और धन्दाताओं को हिंदुस्तान की मूलभूत समस्यायों की चिंता नहीं है, बल्कि समाज को बाजार की दौड़ में शामिल होने के लिए तैयार करने का लक्ष्य होता है. इन्हें अन्तर्राष्ट्रीय उधोग घरानों और राजनीती का समर्थन प्राप्त रहता है. लोकप्रिय सिनेमा और फार्मूलों की बढ़ोतरी की प्रतियोगिता के बिच यदा-कदा होशियारी से बनी कला फ़िल्में भी हिट हो जाती हैं. उनमें अग्रगामी मूल्यपरकता होती है. ऐसी फिल्मों का देश कला के लक्षणों से अनुस्यूत होना जरूरी होता है. जो मूल्य दृष्टि तीसरे और चौथे दशक में थी वह आज की नहीं हो सकती. उद्देश्यपूर्ण लेखक, निर्माता और अभिनेता की अंतर्दृष्टि देखने को मिलाती हैं. ये फ़िल्में अपने ही पूर्व सैद्धांतिक आधार का विरोध करते चलती हैं. ये व्यक्ति की आजादी और समजोंमुखता से प्रेरित होती हैं. `लोकप्रिय फ़िल्में सबसे ज्यादा कथानक की करती हैं. इसके बदले विकसित कला फ़िल्में उनका उत्तर होती हैं. इन फिल्मों का उद्देश्य गंभीर दर्शकों के पास जाना है.

कला फिल्मों को धनदाता-निर्माता के अतिनियंत्रण को अस्वीकार करना पड़ता है. उन्हें अभिनेता की विशिष्टता को गंभीरता से रेखांकित करना पड़ता है. जितने अभिनेताओं को कला की दुनिया ने विशेष रूप से पहचाना है, वे कला फिल्मों से ही आए हैं. प्रसिद्ध अभिनेता “नसीरूदीन शाह” अभिनय कौशल के लिए “ब्रेख्त” को याद करते हैं और कहते हैं कि – “अभिनेता दर्शकों के मर्म को स्पर्श करते हैं. चाहें नायक चरित्र हों या खलनायक. दर्शकों के भीतर दोनों का विवेचन हो जाता है.” इन फिल्मों को हिन्दी के महत्वपूर्ण लेखकों की कृतियों से बहुत मदद मिलाती है. “मृणाल सेन” और “मणि कौल” जैसे फिल्मकारों ने साहित्य और सिनेमा को इन्हीं की मदद से करीब किया है. अच्छे मँजे फिल्म अभिनेताओं को तैयार करने में एनएसडी  नई दिल्ली, जामिया मिल्लिया इस्लामिया युनिवर्सिटी  नई दिल्ली, पूना फिल्म संसथान  पुणे, सत्यजित रे फिल्म संसथान  कलकत्ता की अहम् भूमिका है. कला फिल्मों के दर्शक हिन्दी से ज्यादा मलयालम, तेलुगु, तमिल, कन्नड़ और अब वर्तमान में मराठी भाषाओं में हैं.  हिन्दी में यह काम बंगला से आए सत्यजित रे ने जिस खूबी से किया है – अन्य फिल्मकारों ने नहीं किया है. कला फिल्मों के क्षेत्र में फ़िल्में कभी-कभी ऐसी फ़िल्में बनती हैं  जिनकी भाषा दर्शकों के अनुकूल नहीं होती, इस स्थिति में दर्शक निराश होते हैं. वे अपनी विशिष्टता के लोभ में भाषा को उलझाते हैं, फलतः कथानक पारदर्शी नहीं रह जाता. “उत्पल्दत्त” ठीक कहते है कि – “जनता वैसे ही व्यावसायिक फिल्मों का शिकार है, विशिष्टतावादी भी उसे तंग करने लगते हैं. यह शेष हिन्दी सिनेमा में अधिक है. अरविंदन और अडूर गोपाल कृष्णन जय फिल्मकारों से हिन्दी सिनेमा को सीखना चाहिए. असमर्थ और घटिया लेखकों पर निर्भर रहने के बजाए प्रतिभाशाली लेखकों को पटकथा लिखने के लिए आमंत्रित करना चाहिए. जिन निर्देशकों-निर्माताओं ने पटकथा की गुणवत्ता पर ध्यान दिया है उनमें से “श्याम बेनेगल”, “कुमार साहनी”, “मणि कौल”, “सईद मिर्जा”, “सुधीर मिश्रा”,  “प्रकाश झा”, “संजय लीला भंसाली”, “हंसल मेहता”, “अनुराग कश्यप”, “संजय पूरण सिंह”,“सुजीत सरकार” आदि की कोशिशों को सराहना मिली है.

Dabangg-2गौर करने की बात है भारतीय फिल्म को संसार की प्रतियोगिता में ले जाने के लिए प्रायः व्यावसायिक फिल्मों का चयन नहीं होता, अमेरीका की टाइम पत्रिका जब श्रेष्ठ भारतीय फिल्मों का चयन करती है तो “आवारा”, “मदर इंडिया”, “शोले”, “अंकुर”, “चोखेर बाली”, “मकबूल”, “जन अरण्य”, “देवदास” के नाम आते हैं. पिछले दशकों में अमिताभ बच्चन को प्रशंसा तो मिली है पर उन फिल्मों के कारण जो कला फ़िल्में हैं. ऐश्वर्या राय बच्चन परम्परागत मूल्यों को वहन करने वाली भारतीय फिल्मों की नायिका के रूप में चर्चित हुई हैं. आश्चर्य है कि वर्ष 2003 के अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में 18 भारतीय फिल्मों के पैनोरमा में 5 मलयाली की और दो हिन्दी की फ़िल्में शामिल थीं. सन  2010 में संजय पूरण सिंह की “लाहौर” जो की नेशनल आवार्ड से नवाजी गई, काफी सराहनीय फिल्म थी. जो संजय की पहली ही फिल्म थी. फिल्मों के विकास और चर्चा में फिल्म प्रचार के काफी महत्व है. आजकल तो ऐसी कंपनियां हैं जो ठेके के पॅकेज के आधार पर काम करती हैं. लोकप्रिय फ़िल्में मर्यादा से बाहर जाती हैं. सेंसर बोर्ड की भूमिका और आचरण पर सवाल उठते हैं. यह बोर्ड निष्पक्ष रह सके तो फिल्म जगत समृद्ध होता है. वहां बाजारू फ़िल्में हैं तो कला फ़िल्में भी.

Read more: कला सिनेमा बनाम बाजारू सिनेमा

तनु वेड्स मनु रिटर्न्स

तनु वेड्स मनु रिटर्न्स ****
निर्देशकः आनंद एल राय tanu weds manu2 राइटर: हिमांशु शर्मा
सितारेः कंगना रनौत, आर माधवन, दीपक डोबरियाल, जिमी शेरगिल
छायांकन: चिरंतम दास 
गीत: राजशेखर 
संगीत: क्रसना सोलो एवं तनिष्क-वायु
बैकग्राउंड स्कोर: क्रसना सोलो  
संपादन: हेमल कोठारी 


पीकू के बाद बॉक्स ऑफिस पर अगर किसी फिल्म ने थियेरेटिकल ट्रेलर दिखा कर अपने काया-माया की शक्ति से सममोहित कर थियेटरों तक दर्शको को खीचा है तो तनुजा त्रिवेदी की सौतन दत्तों ने. दत्तों बोले तो कुसूम सांगवान मल्लब कंगना राणावत ने. जी हाँ ! आप भी इस बात के मुतमईन हो जायेंगे, जब दात्तो से रुपहले पर्दे पर रूबरू होंगे. 2011 में आई तनु वेड्स मनु में आप सब जिस तनूजा को देखें है जो बिंदास और अपने बिगड़ी हुई रेप्युटेशन के कारण आपके दिलो में जगह बने थी, वही इस बार  तनु वेड्स मनु रिटर्न्स में कंगना दात्तो उर्फ कुसूम के किरदार में दिल से भोली, दिमाग से समझदार और जुबान की साफ दिखती है. जिसका सपना एथलीट बनाना है.

फिल्म की ओपनिंग रुपहले पर्दे जैसे ही होती है ये मालूमात पड़ता है कि तनु और मनु शादी के चार बसंत बड़ी नोक-झोक से गुजरे है. जिससे दोनों के रिश्ते से अदरक की बदस्तूर कसाव आने लगी है जो यह बताने को काफी है कि अब इस पत्ती-पत्नी के रिश्ते से कैसे पिंड छुड़ाया जाये. इंग्लैंड में उपजे इस विवाद ने तनु को मौका दे देता है और तनु उस हद तक पाहून जाती है कि यहाँ तक कि वो मनु को पागल करार दे देती है और मनोचिकित्सकों के द्वारा उसे सर्टिफाइड मनोरोगी घोषित करवा देती है और उसे मेंटल हॉस्पिटल में भारती करवा के इंडिया के लिए फुर्र हो जाती है.  फिल्म की कहानी को फिल्म के राइटर हिमांशु शर्मा यही से आगे बढ़ाते है. तारीफ-ए-काबिल है हिमांशु कहानी के प्लाट को बड़े ही कसावट के साथ आगे गढ़ने के लिए. फिल्म की कहानी वन लाइनर है, साथ में कहानी की असली हीरो दात्तो कही भी ढीली-ढाली नहीं है.

अब बात करते है निर्देशन की. आनद एल राय ने जिस तरह से फिल्म के स्टोरी और किरदारों के साथ न्याय करते हुए फिल्मांकन किया है. चाहें वो दिल्ली हो या कानपूर या हरियाणा सब को पूरी सजगता के साथ
जीवन की बहुरंगी धाराओं को एकत्र समेटकर उनके विलक्षण व्यक्तित्व को बयां करते हुए सभी को बेहद सरसरी धुन के साथ शाम के पहले सितारों में प्यार के झिझकती बूंदा-बांदी से छुआ कर बेहद तपती दुपहरी में मिसमैच्ड किरदारों के वैवाहिक जीवन की कहानी के साथ बहुत गहरे ख्यालों में छोड़ देते हैं. यही कॉनट्रास्ट फिल्म को एक ऊंचाई पे ले जा के दर्शकों के लिए छोड़ दिया है.

अब बारी आती है फिल्म के किरदारों की जो अपनी-अपनी भूमिकाओं में फिट बैठते हैं. दात्तों ने हिंद्दे सिनेमा जगत को यह संदेश दिया है कि अभिनय की दुनिया में कोई दूसरी कुसूम नहीं हो सकती. कंगना राणावत ने अपने अभिनय की जो केसर फिल्म जगत में घोली है उससे यही कहा जा सकता है कि यह बन्नो का समय है. आर माधवन अपने किरदार को सशक्त जिया है. राजा अवस्थी यानी जिम्मी शेरगील, चिंटू यानी मोहम्मद जीशान अयूब इन किरदारों के माध्यम से अपने को फिर से अभिनय की दुनिया में स्थापित कर दिया है और एक तरफ मनु का बेस्ट फ्रेंड पप्पी यानी दीपक डोब्रियाल जिन्होंने अपने किरदार के मूमेंट्स को अपने अभिनय कौशल से अच्छे सलीके से सवांरा है.

फिल्म का छायांकन चिरंतम दास ने संजीदगी के साथ किया है, संगीत तो सुरीले है ही जिसे पिरोया है क्रसना सोलो और तनिष्क-वायु ने. राजशेखर के लिखे हुए गीत तो सभी के जुबान पे बैठा हुआ है. किसी भी फिल्म का कमर उसका बैकग्राउंड स्कोर होता है जो उसे दर्शकों के दिलो-दिमाग में उठने-बैठने में मदद करता है. इस फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर फिट है जिसे कंपोज़ किया है क्र्सना सोलो ने. इन सभी यूनिट को जो हैंडल कर ले उसे डायरेक्टर बोलते हैं जो इस कसौटी पे आनद अल राय खरे उतरे हैं. यहाँ तक कि फिल्म अगर असल में बनती है तो एडिटर के टेबल पे. यहाँ भी आनद ने बखूबी स्मार्ट वर्क करवाया है एडिटर हेमल कोठारी से . हेमल ने फूटेज को सही से सजाया कर रील को स्टोरी के अनुसार दौड़ाया. कुल मिलाकर आपसब दात्तो के शादी में मेहमान बन सकते हैं. मेहमान नवाजी के लिए साफ दिलवाली दात्तो बोले आपसब की गुडिया कुसूम आपका थियेटरों में रुपहले पर्दे पे इंतजार कर रही है. अरे ! आप अभी-भी लेट नहीं हुए हैं. झट से लपक लीजिये शादी को. दात्तो, ओह ! नो ! कुसूम गुडिया मेरे तरफ से शादी के लिए ढेरों मुबारका !  

Read more: तनु वेड्स मनु रिटर्न्स

ध्वनियुक्त हिन्दी सिनेमा का आगाज

ध्वनियुक्त हिन्दी सिनेमा सिनेमा का आगाज

Alam Ara1913 में दादा साहेब फालके द्वारा प्रथम कथाचित्र राजा हरिश्चंद्र के प्रदर्शन के बाद पारसी थियेटर से जुड़े हुए तमाम पारसी सेठों, कलाकारों ओर तकनीशियनों का ध्यान इस नयी कलाविधा की ओर गया. 1913 से 1931 के दरमियाँ मदान थियेटर्स, इम्पीरियल, कोहिनूर फिल्म कंपनी, ओरिएण्टल फिल्म कंपनी और महाराष्ट्र फिल्म कंपनी सहित अनेक फिल्म कंपनियों ने 1913 से 1931 के दौरान लगभग 1200 सौ फिल्मों और आठ धारावाहिकों का निर्माण कर डाला. मूक फ़िल्में 1934 तक बनती रहीं. 1934 से ही इनका निर्माण लगभग समाप्त हुआ. इस वर्ष कुल आठ मूक फ़िल्में बनी. 1930 से ही छवि के साथ ध्वनि को जोड़ने की प्रक्रिया आरम्भ हो गई थी. इसमें पहली सफलता इम्पीरियल कंपनी के हाथ लगी.

भारत की पहली सावक (बोलती) फिल्म आलम आरा जिसके निर्माता इम्पीरियल मूविटोने के आर्देशिर इरानी थे, बम्बई के मैजिस्टिक थियेटर में 14 मार्च 1931 को प्रदर्शित हुई थी. आर्देशिर ईरानी हालीवुड के यूनिवर्सल स्टूडियो के भारतीय प्रतिनिधि थे और उनहोंने अब्दुल अली-यूसुफ अली के साथ मिलकर 55 वर्षों तक बम्बई के अलेक्स्जेन्दर सिनेमा का सञ्चालन किया. आर्देशिर ईरानी ने पहली सम्पूर्ण रंगीन फिल्म किसान कन्या का भी निर्माण 1937 में ही किया था. 1934 में उनहोंने अंग्रेजी में नूरजहाँका निर्माण किया था.40 वर्ष की उम्र में अर्देशिर हिंदुस्तान के स्थापित निर्मात-निर्देशक-वितरक एवं फिल्म प्रदर्शक के रूप में अपनी सबसे मत्वपूर्ण जगह बना चुके थे. उन्होंने हिंदी-अंग्रेजी-तमिल-तेलगु के साथ-साथ बर्मीज़, पश्तो आदि भाषाओँ में भी फ़िल्में बनाई. वे मूलतः निर्माता थे. पञ्च मूक फिल्मों और दो सावक फिल्मो का ही उन्होंने निर्देशन किया किन्तु उन्होंने इम्पीरियल फिल्म कंपनी के अंतर्गत लगभग २५० सौ फिल्मो का निर्माण किया. इम्पीरियल ने हिंदी सिनेमा को बिलमोरिया बन्धु, पृथ्वीराज कपूर, याकूब, महबूब खान, मुबारक, सुलोचना जैसे अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तित्व प्रदान किये.

इम्पीरियल फिल्म कंपनी की मदन थियेटर्स के साथ गहरी प्रतिस्पर्धा थी और मदन की पहली फिल्म शीरीं फरहाद, आलम आरा से एक महीने बाद ही प्रदर्शित हुई थी. शीरी फरहाद निश्चित रूप से आलम आरा की तुलन अ में बेहतर निर्माण गुणवता की फिल्म थी, पैर हिंदी फिल्म की पहली फिल्म होने का गौरव तो आलम आरा के हिस्से में ही लिखा था. मुस्लिम पृष्ठभूमि पर आधारित आलम आरा एक वेशभूषा प्रधान फिल्म थी. कमारपुर के बादशाह आदिल सुल्तान की नौबहार और दिलबहार दो बेगुमें थीं. नौबहार नेक और दयालु. इसके उल्ट दिलबहार तेज़-तर्रार और कपटी. बादशाह प्रकट रूप से दोनों को बराबर चाहते. किन्तु दिल ही दिल मै नौबहार उनकी सबसे चहेती थी. सब शुख होते हुए भी बादशाह को कोई संतान नहीं थी. एक फकीर के आशीर्वाद से नौबहार को बीटा होता होता है.नौबहार को बीटा होने पर दिलबहार जलभुन जाती है. वह अपने महत्व को कायम रखने के लिए बदला लेनी की ठानती है. प्रतिशोध के अप्निक योजना के सल्तनत के सिपहसालार को अपनी जवानी के जाल में फंसाकर शामिल करने की कोशिश में असफल होने पर वह उसे बर्बाद कर देती है. जहाँ सिपहसालार को जेल में दल दिया जाता है, वहीँ उसके बीबी और बच्चे राज्य से निकल दिये जातें हैं.

Alamजंगल में भटकते हुए धोखे से शिकारी के एक तीर से सिपहसालार की पत्नी की मौत हो जाती है. उसकी बेटी आलम आरा का लालन-पोषण वाही शिकारी करता है. मरते हुए सिपहसालार की पत्नी शिकारी को सारी कहानी बतला देती है और उससे ये वचन लेती है कि ये बातें उसकी बेटी आलम आरा के बालिग होने पर ही उसे बतलाना. शहजादा और आलम आरा अलग-अलग बड़े होतें और अंत में उनका मिलन होता है. फकीर के हीरे के दिये हीरे के हार को बदलकर शहजादे की जान लेने की साजिश रचनेवाली दिलबहार अपने किये की सजा पाती है और शहजादे और आलम आरा का मिलन होता है.

शहजादा कमर की भूमिका मास्टर विट्ठल और आलम आरा की भूमिका जुबैदा ने की थी. सिपहसालार आदिल का किरदार पृथ्वीराज कपूर ने निभाया था. बादशाह थे एलिजर और उनकी बेगमें नौबहार और दिलबहार बनीं थीं जिल्लोबाई और सुशीला. घुमंतू फ़कीर का किरदार वजीर मुहम्मद खान ने अदा किया था.इनके अतिरिक्त जगदीश सेठी, एल. वी. प्रसाद भी संक्षिप्त भूमिकाओं में थे. नायक की भूमिका जो विट्ठल ने निभाई उसे पहले सुप्रसिद्ध निर्माता-निर्देशक महबूब खान निभाने वाले थे. महबूब खान ने अपनी शुरूआत इम्पीरियल में सहायक कलाकार के रूप में ही की थी.

आलम आरा पारसी थियेटर्स के लोकप्रिय लेखक जोसफ डेविड के सफल नाटक पर आधारित थी.फिल्म की पटकथा भी खुद डेविड ने ही तैयार की थी.ए. डी. एम इरानी ने छायांकन किया था.सावक फिल्म बनाने के लिए एक विशेष आलेखन उपकरण की आवश्यकता थी. जिसे तनर सिस्टम कहते है. इस मशीन की सब जानकारियां एवं कार्य-पढ़ती का अध्ययन करने के लिए ईरानी स्वयं इंग्लैंड गए और वहां से बाकायदा प्रशिक्षण लेकर लौते थे. जब वे यह विशिष्ट उपकरण लेकर बम्बई पहुंचे तो टाइम्स आफ इंडिया ने इस मशीन को लेकर लेख छापे और उस मशीन की तस्वीर भी डी. इस कैमरे को चालने के लिए ईरानी ने अम्रिकां विल्फोर्ड डेनिम की सेवाएं प्राप्त कीं. उस समय उन्हें इस कम के लिए सौ रूपये प्रतिदिन दिया गया था.

आलम आरा के संगीतकार थे फिरोज श मिस्त्री, आलम आरा में कुल सात गीत थें, जिन्हें उन्हीं अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने गया था जिन पर वे चित्रित किये गए थे. इन सात गानों में सबसे अधिक लोकप्रिय वजीर मुहम्मद खान का गया दे दे खुदा के नाम पर प्यारे, ताकत हो गर देने की.इसमें कोरस का भी प्रयोग किया गया था. इस गीत को हिंदी सिनेमा का पहला गीत होने का सौभाग्य भी मिला और वजीर मुहम्मद को प्रथम गायक होने का.इनके अतिरिक्त अन्य गीत थे – बदला दिवाएगा तू सितमगारों से, रूठा है आसमान गम हो गया माहताब, तेरी कटीली निगाहों ने मारा, दे दिल को आराम आय सकी-ए-गुलफाम. भर-भर के जाम पिलाए जा, और दरस बिना मोरे हैं तरसे नैना प्यारे.

आलम आरा जब बन कर तैयार हुई तो इसका प्रदर्शन भी एक समस्या बनी. इसको दिखने के लिए एक विशेष साउंड प्रोजेक्टर की आवश्यकता थी. इसके लिए अब्दुल अली-यूसुफ अली बंधुओं ने बहुत सहायता की. उनहोंने विदेश से टॉकी प्रोजेक्टर बुलवाया तथा मैजेस्टिक थियेटर को टॉकी थियेटर में बदला गया. तब जा के कहीं आलम आरा नाचती-गाती-बोलती नज़र आई. फिल्म के प्रचार-प्रसार भी उस समय के अनुसार बहुत भव्य ढंग से हुआ था. पुराणी फिटिन घोड़ागाड़ी पर दिढोरोची तीन के भौंपू पर चिल्ला-चिल्लाकर प्रचार करते थे, मुर्दा जिंदा हो गया . . नया अजूबा देखो, चलती-फिरती, नाचती-गाती तस्वीरें चार आने में.

आज आलम आरा की चाँद तस्वीरें और पोस्टर ही शेष हैं.यह अफसोस की बात भी कही जा सकती है कि हिन्दी की पहली फिल्म की कोई स्मृति हम बचाकर नहीं रख सकें. वस्तुतः १९३१ से १९४६ तक बनाई गई अधिकांश फ़िल्में अब नष्ट हो चुकीं हैं. फिल्मों को सुरक्षित रखने का काम आधुनिक तकनीक के आने के तक बड़ा तकलीफदेह और महंगा था. नेशनल फिल्मस आर्कैव्ज में बहुत कम फ़िल्में ही सुरक्षित रखी जा सकी हैं. एक फिल्म आर्काइव ही सभी फिल्मों को सुरक्षीत रख भी नहीं सकता.

आलम आरा से तीन ऐसी शख्सियतें जुडी थीं जिन्होंने आगे चल कर बड़ा नाम कमाया लेकिन आलम आरा मै उनकी भूमिकाएं अत्यंत संक्षिप्त थीं. पहले महबूब खान जो आलम आरा मै हो कर भी नहीं हो सके. दुसरे पृथ्वीराज कपूर, जिन्होंने सिपहसलार की छोटी-सी भूमिका की थी और तीसरे दक्षिण भारत के प्रख्यात निर्माता-निर्देशक एल.वी.प्रसाद, जिन्होंने एक बिल्कुल मामूली भूमिका अदा की थी.

आलम आरा से हिन्दी सिनेमा में जो गीत-संगीत-नृत्य की परम्परा शुरू हुई. वह आजतक बरक़रार है. अधिकांश हिन्दी सिनेमा गीत-संगीत से भरपूर हैं. सिनेमा मै अनेक उपादानों का महत्व घटता-बढता रहा है. लेकिन संगीत का महत्व आदि से लेकर आजतक स्थाई रूप से बरक़रार है.नानूभाई वकील ने आलम आरा का पुनर्निर्माण 1956 और 1973 में किया था.

Read more: ध्वनियुक्त हिन्दी सिनेमा का आगाज