Warning: First parameter must either be an object or the name of an existing class in /home/hindice/public_html/libraries/windwalker/src/View/Html/ItemHtmlView.php on line 60

स्वाधीनता संग्राम के राजनेता और हिन्दी

14 सितंबर 'हिंदी दिवस' के अवसर पर 

14 सितंबर ‘हिन्दी दिवस’ के रुप में मनाया जाता है और यह क्यों मनाया जाता है, यह सर्वविदित है. आज हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा ही नहीं राजभाषा भी है. हिन्दी को एक प्रादेशिक भाषा की हैसियत से लेकर राष्ट्रभाषा के रुप में लोकप्रिय और सर्वमान्य बनने में और फिर भारत की राजभाषा बनने में कई शताब्दियां लगी हैं. राजभाषा के रूप में हिन्दी को जो मान्यता दी गयी उसमें स्वतंत्रता-संग्राम के हमारे राजनेताओं की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही हैं. यह देखकर आश्चर्य होता है कि हिन्दी के विकास के लिए उन चिन्तकों, मनीषियों और नेताओं ने अभूतपूर्व कार्य किया है जो अधिकतर हिन्दीतर प्रदेश के थे. हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाने का विचार सर्वप्रथम बंगाल में ही उदित हुआ और प्रारम्भ से अन्त तक इसे वहां के मूर्धन्य नेताओं का सक्रिय सहयोग प्राप्त हुआ. पूरे देश के लिए एक राष्ट्रभाषा हिन्दी की कल्पना करनेवालों में सबसे अग्रणी हैं बंगाल के श्री केशवचंद्र सेन, जिन्होंने 1873 में अपने पत्र ‘सुलभ समाचार’ (बंगला) में लिखा “यदि भाषा एक न होने पर भारतवर्ष में एकता न हो तो उसका उपाय क्या है? समस्त भारतवर्ष में एक भाषा का प्रयोग करना इसका उपाय है. इस समय भारत में जितनी भी भाषाएं प्रचलित हैं, उनमें हिन्दी भाषा प्राय: सर्वत्र प्रचलित है. इस हिन्दी भाषा को यदि भारतवर्ष की एक मात्र भाषा बनाया जाए तो अनायास ही (यह एकता) शीघ्र ही सम्पन्न हो सकती है.” इनके अलावा अन्य अनेक राष्ट्रीय नेताओं ने प्रान्तीयता की भावना से ऊपर उठकर मुक्त कंठ से हिन्दी का समर्थन किया, जिनकी हिन्दी सेवा अविस्मरणीय रहेगी.

“स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है जिसे मैं प्राप्त करके रहूंगा” का नारा देनेवाले नेता बाल गंगाधर तिलक का स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में विशिष्ट स्थान है. भाषा के बारे में तिलक का विचार था कि हिन्दी ही एक मात्र भाषा है जो राष्ट्रभाषा हो सकती है. हिन्दी का समर्थन करते हुए ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ में उन्होंने लिखा था “यह आंदोलन उत्तर भारत में केवल एक सर्वमान्य लिपि के प्रचार के लिए नहीं है, यह तो उस आन्दोलन का एक अंग है जिसे मैं राष्ट्रीय आन्दोलन कहूंगा और जिसका उद्देश्‍य समस्त भारत वर्ष के लिए एक राष्ट्रीय भाषा की स्थापना करना है, क्योंकि सबके लिए समान भाषा राष्ट्रीयता का महत्वपूर्ण अंग है, अतएव अदि आप किसी राष्ट्र के लोगों को एक दूसरे के निकट लाना चाहें तो सबके लिए समान भाषा के बढ़कर सशक्त अन्य कोई बल नहीं है.”

तिलक जहां हिन्दी को राष्ट्रभाषा मानते थे वहां देवनागरी को हिन्दी की लिपि मानते थे. तिलक ने राष्ट्रीय चेतना को प्रबल करने के लिए सन् 1903 में ‘हिन्दी केसरी’ नामक पत्रिका का प्रकाशन भी प्रारंभ किया और इस बात का परिचय दिया कि जन साधारण तक अपने विचारों को पहुंचाने के लिए केवल हिन्दी ही एक सरल और सशक्त माध्यम है. साथ ही तिलक ने अंग्रेजी की बजाय हिन्दी में भाषण देने की परम्परा आरंभ कर अन्य नेताओं के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत किया.

महात्मा गांधी भाषा के प्रश्न को राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रश्नों में सबसे अधिक महत्वपूर्ण मानते थे. उन्होनें प्रारंभ से हिन्दी को स्वतंत्रता संग्राम की भाषा बनाने के लिए अथक परिश्रम किया. उनका अनुभव था कि “पराधीनता चाहे राजनीतिक क्षेत्र की हो अथवा भाषाई क्षेत्र की, दोनों ही एक दूसरे की पूरक और पीढ़ी-दर-पीढ़ी सदा परमुखापेक्षी बनाये रखने वाली है” सन् 1917 में उन्होंने एक परिपत्र निकाल कर हिन्दी सीखने के कार्य का सूत्रपात किया. गांधीजी की प्रेरणा से 1925 में काँग्रेस ने यह प्रस्ताव पास किया कि कांग्रेस का, काँग्रेस की महासमिति का और कार्यकारिणी समिति का कामकाज आमतौर पर हिन्दुस्तानी में चलाया जायेगा. इसी का परिणाम था कि सन् 1925 में अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन भरतपुर में हुआ जिसकी अध्यक्षता गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने की और उन्होंने हिन्दी में बोलकर हिन्दी का प्रबल समर्थन किया.

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने विभिन्न राज्यों में हिन्दी-प्रचार करने के लिए नेताओं को जहाँ प्रेरित किया वहीं लोगों के अलग-अलग जत्थे को राज्यों में भेजा. उन्होंने खुद अपने बेटे श्री देवदास गांधी को हिन्दी-प्रचार के लिए भारत के दक्षिण में भेजा था. आज़ादी के इस मुहिम में इसे पुनीत कर्तव्य मानकर विभिन्न राज्यों में विभिन्न हिन्दी-प्रचारक गए और वहाँ उन्होंने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया. राष्ट्रीय आंदोलन में शिरकत करते हुए राष्ट्रीय चेतना से युक्त हमारे ये हिन्दी-प्रचारक आज़ादी में और आज़ादी के बाद भी लोगों को जागृत करते हुए उनके बीच हिन्दी का प्रचार-प्रसार करते रहे.

गांधीजी के प्रयत्नों से तमिलनाडु में हिन्दी के प्रति ऐसा उत्साह प्रवाहित हुआ कि प्रांत के सभी प्रभावशाली नेता हिन्दी का समर्थन करने लगे. यह वह समय था जब चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जैसे नेता हिन्दी के प्रचार को अपना भरपूर सहयोग दे रहे थे.

‘पंजाब केसरी’ के नाम से प्रसिद्ध लाला लाजपतराय एक महान देशभक्त शिक्षाशास्त्री ही नहीं, एक प्रभावशाली पत्रकार भी थे. पंजाब में हिन्दी के प्रचार का पूरा श्रेय लालाजी को जाता है. जब उर्दू हिन्दी का विवाद जोरों से चल रहा था, तब लालाजी ने हिन्दी का बड़ा समर्थन किया और उन्हीं के प्रयत्न से पंजाब के शिक्षा क्षेत्र में हिन्दी को स्थान मिला. उन्होंने अनेक शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की जिनमें हिन्दी का अध्ययन अनिवार्य बनाया गया. लालाजी की प्रेरणा से ही पंजाब विश्वविद्यालय के पाठयक्रम में हिन्दी को स्थान मिला.

     स्‍वतंत्रता संग्राम के इतिहास पुरूष के रूप में विख्‍यात पंडित मदनमोहन मालवीय जी का नाम हिंदी प्रचारकों में बड़े आदर और सम्‍मान के साथ लिया जाता है. वे न केवल एक महान हिंदीव्रती थे बल्कि हिंदी आंदोलन के अग्रणी नेता भी थे. हिंदी के प्रचार एवं प्रसार और हिंदी के स्‍वरूप निर्धारण दोनों ही दृष्टियों से उन्‍होंने हिंदी की अभूतपूर्व सेवा की. यह उन्‍हीं का प्रोत्‍साहन, समर्थन और प्रेरणा थी जिसकी बदौलत हिंदी प्रशासन एवं राजकाज की भाषा बनी. `हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान’ की सेवा उनका संकल्प था. उनके सार्वजनिक जीवन की सक्रियता, उनके आदर्श और उनकी योजनाएँ इसी संकल्प से प्रेरित थी. मालवीयजी जीवन-पर्यन्त भारतीय स्वराज्य के लिए कठोर तप करते रहे. उसी के समानान्तर हिन्दी की प्रतिष्ठापना के लिए भी वे अनवरत साधना में लीन रहे. सन् 1986 के काँग्रेस अधिवेशन में श्री मालवीय के भाषण से प्रभावित होकर कालाकांकर के राजा ने अपने हिन्दी दैनिक ‘हिन्दुस्तान’ का उन्हें संपादक बनाया उसके बाद उन्होंने हिन्दी साप्तहिक ‘अभ्युदय’ प्रारंभ किया और 1910 में प्रयाग से ‘मर्यादा’ नामक हिन्दी पत्रिका तथा सन् 1933 से ‘सनातन धर्म’ नामक हिन्दी पत्र भी प्रारंभ किया. उन्हीं की प्रेरणा से कई और हिन्दी पत्रिकाओं का जन्म हुआ.

राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन की हिन्दी सेवा भी अप्रतिम है. वे हिन्दी साहित्य सम्मेलन के कर्ताधर्ता थे और उनसे हिन्दी प्रचार के कार्य को बड़ी गति मिली. टण्डनजी ने अपना सारा जीवन हिन्दी की सेवा और हिन्दी साहित्य की अभिवृद्धि में अर्पित किया. हिन्दी को आगे बढ़ाने और राष्ट्रभाषा के रूप में इसे सर्वोत्तम स्थान देने के लिए टण्डन जी ने कठिन परिश्रम किया. इन्होंने 10 अक्टूबर 1910 को वाराणसी के नागरी प्रचारिणी सभा के प्रांगण में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की स्थापना की. फिर 1918 में उन्होंने ‘हिन्दी विद्यापीठऔर 1947 में हिन्दी रक्षक दलकी स्थापना की. टण्डन जी  हिन्दी को देश की आज़ादी के पहले आज़ादी प्राप्त करने काऔर आज़ादी के बाद आज़ादी को बनाये रखने कासाधन मानते थे. उन्होंने हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए हरसंभव प्रयास किए. अपने अध्यक्षीय भाषण में उन्होंने बहुत ही आकर्षक ढंग से हिन्दी भाषा के महत्व को बताया ताकि सबके मन में हिन्दी भाषा के लिए प्रेम जाग जाए और देशभर में हिन्दी का ही प्रचार-प्रसार हो. उन्होंने बहुत ही सरल ढंग से हिन्दी को प्रगति के मार्ग पर लाने का प्रयास किया.

राष्ट्रीय नेताओं में देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसादजी की हिन्दी सेवा से कौन परिचित नहीं है. भारतीय संविधान सभा के अध्यक्ष के रुप में हिन्दी को उचित स्थान दिलाने का श्रेय डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को ही है. उन्होंने ही भारतीय संविधान की भारतीय भाषाओं में परिभाषिक कोष तैयार करवाने का महत्वपूर्ण कार्य किया है. भारत के प्रथम राष्ट्रपति के पद से उन्होंने जो हिन्दी की सेवा की उसका विशेष महत्व है. उनके कार्यकाल में सरकारी स्तर पर हिन्दी को मान्यता मिली.

 ''यदि भारत में प्रजा का राज चलाना है, तो वह जनता की भाषा में चलाना होगा'' इन शब्दों में जनता की भाषा की वकालत करने वाले काका कालेलकर जी का नाम हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार और विकास में अतुलनीय योगदान देने वालों में आदर के साथ लिया जाता है. दक्षिण भारत में हिन्दी प्रचार के वे कर्णधार रहे और गुजरात में रहकर हिन्दी प्रचार के कार्य को आगे बढ़ाया. 1942 में वर्धा में जब हिन्दुस्तानी प्रचार सभा की स्थापना हुई तो काका साहब ने ‘हिन्दुस्तानी’ के प्रचार के लिए पूरे देश का भ्रमण किया. उन्होंने हिन्दी के प्रचार कार्यक्रम को राष्ट्रीय कार्यक्रम के रूप में प्रतिष्ठित किया और सन् 1938 में दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा के अधिवेशन में इसका खुलकर ऐलान भी किया. अपने इसी लक्ष्य पर अडिग रहते हुए उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन हिन्दी के विकास और प्रचार-प्रसार में लगा दिया. 

श्री केशवचन्द्र सेन पहले ऐसे राष्ट्रीय नेता थे जिन्होने ‘राष्ट्रभाषा हिन्दी’ के महत्व को हृदय से समझा और स्वीकार किया. साथ ही, भारत को एकता के सूत्र में बांधने की दृष्टि से सभी से यह आह्वान किया कि सब हिन्दी को आत्मसात करें क्योंकि हिन्दी हमारे देश की आत्मा है. उन्होने हिन्दी के प्रचार- प्रसार हेतु हर संभव प्रयास किया. उनका मानना था कि हमारा प्राथमिक उद्देश्य है अपनी बात को आखिरी व्यक्ति तक पहुँचाना और इस देश में आखिरी व्यक्ति तक संदेश पहुँचाने का सरलतम मार्ग है हिन्दी. केशव जी का मत था कि हिन्दी के माध्यम से हम किसी व्यक्ति को ही नहीं अपितु उसकी आत्मा तक को स्पर्श करने की क्षमता रखते हैं क्योंकि हिन्दी भारत के  जनसामान्य की आत्मा में बसती है.

राष्ट्रभाषा के प्रहरी के रुप में सेठ गोविन्ददासजी कौन भुला सकता है. अपने युवाकाल में ही कई हिन्दी पत्रिकाएं प्रारंम्भ कर सेठजी ने हिन्दी के प्रति अपने प्रेम का परिचय दिया था. 18 मई सन् 1949 में जब भारतीय संविधान सभा की बहस चल रही थी तब गोविंद दास जी ने कहा था –“मैं व्यक्तिगत रूप से यह चाहता हूं कि – संविधान मौलिक रूप में हमारी मुख्य भाषा में हो, अंग्रेजी में नहीं; जिससे हमारे भावी न्यायाधीश अपनी भाषा पर निर्भर हो सकें, विदेशी भाषा पर नहीं.” भारतीय लोकसभा के सदस्य के रुप में उन्होंने हिन्दी के प्रसार के लिए कई कदम उठाये जो हिन्दी को राजभाषा का स्थान दिलाने में सहायक सिद्ध हुए. उन्होने हिन्दी की समृद्धि और प्रचार के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया था. इसी कारण से 1963 में सेठ जी को अखिल भारतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन का अध्यक्ष चुना गया था.

यहां हमने हिन्दी के प्रचार प्रसार एवं उसे राजभाषा की मंजिल तक पहुंचाने वाले कुछ प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं के योगदान का अत्यंत संक्षिप्त उल्लेख किया है. इसके अतिरिक्त अन्य बहुत से महत्वपूर्ण नेताओं के नाम गिनाये जा सकते हैं, जिन्होंने हिन्दी का प्रबल समर्थन किया और हिन्दी को विकसित करने में अपना बहुमूल्य सहयोग दिया.

अनुराधा महेन्द्र, उप महाप्रबंधक

आईडीबीआई बैंक, बीकेसी, मुंबई

{fcomment}

 

Read more: स्वाधीनता संग्राम के राजनेता और हिन्दी

कवि और दुनिया

Writer: विस्लावा शिम्बोस्र्का

Wisława Szymborska, Poland

Title: The Poet and the world

Noble Prize Recipient 1996 

Translator: Anuradha Mahendra  

1923 में कारकोन में जन्मीं पोलैंड की कवयित्री विस्लावा शिम्बोस्र्का को 1996 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया था. गहरी राजनीतिक चेतना और सामाजिक विडम्बनाओं वाली इस कवयित्री ने अपनी रचनाओं की सादगी और गहराई से पाठकों को भीतर तक छुआ है. प्रस्तुत है नोबेल पुरस्कार प्राप्त करते समय दिया गया उनका व्याख्यान. 

कहते हैं किसी व्याख्यान में सबसे मुश्किल पहला वाक्य होता है. खैर, वह तो मैंने पार कर लिया. पर मु»ो तो लगता है कि इसके बाद भी सभी वाक्य – तीसरा, छठा, दसवां और अंतिम पंक्ति तक पहुंचाने वाला हर वाक्य मेरे लिए उतना ही मुश्किल होगा, क्योंकि मु»ो कविता पर बोलना है. मैंने इस बाबत बहुत कम कहा है – लगभग नहीं के बराबर. और जब कभी मैंने कुछ कहा तो हमेशा मेरे भीतर चोरी-छिपे एक आशंका आ बैठी कि यह काम मेरे वश का नहीं है. यही वजह है मेरा यह व्याख्यान छोटा ही होगा. कमियों को आसानी से पचाया जा सकता है अगर वह थोड़े-थोड़े अनुपात में परोसी जाएं. 

हमारे समकालीन कवित अविश्वास और संशय से भरे हुए हैं - खासकर स्वयं को लेकर. वे अपने कवि होने को एक अनमनेपन से कबूल करते हैं, गोया इसके लिए कुछ शर्मिंदा हों. पर हमारे आज के इस कोलाहलपूर्ण समय में अपनी खामियों को स्वीकार कर लेना ज्«यादा आसान है, बशर्ते उन्हें जरा आकर्षक तरीके से पेश किया जाए. इसके बनिस्बत अपनी खूबियों को पहचाना मुश्किल काम है, क्योंकि ये हममें कहीं गहरे छिपी रहती हैं. दूसरे, हमारे आज के कवियों की जब कभी किसी अजनबी से मुलाकात होती है या जब कभी इनके सामने कोई प्रश्नावली भरने की नौबत आती है या यूं कहें कि जब कभी ऐसी स्थिति आती है कि अपने काम के बारे में बताये बगैर कोई चारा नहीं होता हो तो ये कवि लोग ‘कवि’ कहलवाने के बजाय एक सामान्य शब्द ‘लेखक’ के रुप में परिचय देना ज्«यादा पसंद करते हैं अथवा वे ‘कवि’ की जगह पर किसी दूसरे ऐसे कार्य से जोड़कर खुद को पेश करते हैं जो वे लेखन के अलावा करते हैं. किसी दफ़्तर के अफसर से लेकर बस में बैठे मुसाफिरों तक को जब पता चलता है कि उन्हें किसी कवि से पेश आना है तो उनके व्यवहार में संदेह और अतिरिक्त सजगता आ जाती है. मु»ो लगता है कि दार्शनिकों के साथ भी शायद कुछ इसी तरह का घटता है. फिर भी वे बेहतर स्थिति में हैं, क्योंकि गाहे-ब-गाहे वे खुद को विद्वान होने की गरिमा से मंडित कर सकते हैं. ‘दर्शनशास्त्र का प्रोफेसर’ – ओेह! यह वाकई कितना सम्मानजनक-सा ध्वनित होता है. 

पर कोई ‘कविता का प्रोफेसर’ नहीं होता. यदि होता तो इसका अर्थ यह निकलता कि काव्य-सृजन एक पेशा है जो विशेषज्ञतापूर्ण अध्ययन, नियमित परीक्षाओं, संदर्भ सूचियों और पाद टिप्पणियों से भरे सैद्धांतिक लेखों और अंतत: दीक्षांत समारोहों में सम्मान के साथ दिये गये डिप्लोमा- डिग्रियों के द्वारा हासिल किया जा सकता है. इसका अर्थ यह भी होता कि कवि बनने के लिए सुंदर कविताओं के पन्ने पर पन्ने रंग डालना ही पर्याप्त नहीं है, ज्«यादा जरुरी है शासकीय मुहर लगा कागज का टुकड़ा. आपको याद होगा रुसी कविता के उत्कृष्ट कवि जोसेफ ब्रौडस्की को, जिन्हें बाद में नोबेल पुरस्कार मिला, एक बार ठीक इन्हीं वजहों से निर्वासन की सजा दी गयी थी. उन्होंने ब्रौडस्की को ‘परजीवी’ (पैरासाइड) करार दिया था, क्योंकि उनके पास वह शासकीय प्रमाणपत्र नहीं था जो उन्हें कवि होने का अधिकार दिलाता. 

बरसों पहले ब्रौडस्की से व्यक्तिगत रुप से मिलने का सौभाग्य मिला और मैंने पाया कि तब तक मैं जितने भी कवियों को जानती थी उनमें सिÒ«îá वही थे जिन्हें अपने कवि होने पर गर्व था. वे बिना किसी संकोच के खुद को कवि कहलाना पसंद करते थे. वे दूसरे कवियों से एकदम अलग थे. वे अपने कवि होने को एक विद्रोही किस्म की मुक्ति के साथ सामने रखते थे. मु»ो लगा कि वे इसलिए ऐसा कर सके क्योंकि युवावस्था में उन्होंने जो क्रुर अपमान »ोला था, उसकी स्मृतियां इस शब्द के साथ उनके जे«हन में बसी हुई थीं. 

वे देश ज्यादा भाग्यशाली हैं, जहां मानवीय गरिमा को इस तहर आनन-फानन में कुचला नहीं जाता. कवियों की ख्वाहिश होती है कि वे प्रकाशित हों, उन्हें पढ़ा जाए, समझा जाए, पर वे सामान्य भीड़ से अलग अपनी पहचान बनाने और रोजमर्रा की चक्की में पिसने से बचकर शायद ही कुछ कर पाते हैं. ज्«यादा पुरानी बात नहीं है जब ऐसा नहीं होता था. इसी सदी के शुरुआती दशकों में कवियों ने अपने अजीबोगरीब पहरावों और सनक-भरे आचरण से हमें चौंकाना चाहा था. पर यह सब महज सार्वजनिक प्रदर्शन की चीज थी. अक्सर ऐसे क्षण आये जब कवियों को अपने आडम्बर, ताम-झाम और दूसरे काव्यमय वसन-भूषण उतारकर बंद कमरे में एक कोरे कागज का सामना करना पड़ा –धीरज के साथ, अपने ‘निजत्व’ की प्रतीक्षा करते हुए आखिरकार यही था जो वास्तव में मायने रखता था. 

यह संयोग नहीं है कि बड़े-बड़े वैज्ञानिकों और कलाकारों की फिल्म जीवनियां धड़ल्ले से निर्मित की जाती हैं. ज्«यादा महत्त्वाकांक्षी निर्देशक हुआ तो वह बड़े विश्वसनीय तरीके से उस सारी सृजनात्मक प्रक्रिया को पुनर्निमित करना चाहता है जिससे गुजरकर महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक खोजों और उत्कृष्ट कलाकृतियों ने जन्म लिया. और कुछ खास तरह के वैज्ञानिक श्रम को किसी हद तक चित्रित किया भी जा सकता है. प्रयोगशालाएं, छोटे-बड़े उपकरण और भारी-भरकम मशीनों को जीवंत दिखाया जा सकता है; ऐसे दृश्य कुछ समय तक के लिए दर्शक को बांध भी लेते हैं. और फिर क्लाइमेक्स का वह रोमांचक क्षण -क्या थोड़े-थोड़े परिवर्तनों के साथ हजार बार दोहराया गया वह प्रयोग इस बार कामयाबी को छू सकेगा? यह सब बहुत नाटकीय हो सकता है. चित्रकारों के बारें में दिखायी गयी फिल्में भव्य हो सकती हैं, क्योंकि उनमें किसी प्रसिद्ध चित्र के धीरे-धीरे आकार लेते जाने को पुनर्सर्जित किया जा सकता है – पेंसिल स्केच से लेकर अंतिम ब्रश स्ट्रोक तक. संगीतकारों पर बनी फिल्मों में संगीत की बहार रहती है- संगीतकार के कानों में जन्मी स्वरलहरी की पहली थिरकन से वाद्यवृंद की एक परिपक्व प्रस्तुति तक की सम्पूर्ण यात्रा! हां, पर यह सब बहुतक बचकाना और सीधा-सपाट है और इसमें कहीं भी उस रहस्यमय मानसिक अवस्था के बारे में कुछ पता नहीं चलता जिसे आमतौर पर अंत:प्रेरणा कहा जाता है. पर इन फिल्मों में कम से कम कुछ तो ऐसा मौजूद होता ही है जिसे देखा जा सकता है, सुना जा सकता है. 

इस मामले में कवियों की स्थिति एकदम निराशाजनक है. उनका काम कहीं से भी फोटोजेनिक नहीं होता. कोई शख्स एक मेज पर बैठा रहता है या सोफे पर लेटा रहता है और एकटक दीवार या छत को घूरता रहता है. कभी-कभार यह शख्स कुछ पंक्तियां लिखता है, पर पंद्रह मिनट बाद ही उन्हें काट भी देता है. उसके बाद फिर एक और घंटा बीत जाता है, इस दौरान कुछ भी नहीं घटता. इस तरह के दृश्य को देखने में भला किसकी रुचि हो सकती है? 

मैंने अंत:प्रेरणा का जिक्र किया. समकालीन कवियों से जब आप पूछें कि यह क्या है और क्या सचमुच ऐसी कोई चीज होती है तो वे टालमटोल के जवाब देने लगते हैं. ऐसा नहीं है कि उन्होंने अपने भीतर कभी इस सृजनात्मक आवेग को अनुभव नहीं किया हो, पर बात सिर्फ इतनी है कि जिस चीज को आप खुद न समझ पा रहे हों, उसे दूसरों को कैसे बताया जाए?

कभी-कभार जब मुझसे इस बारे में पूछा गया है तो मैं भी अचकचा गयी हूँ, हालांकि मेरा कहना यह है कि अंत:प्रेरणा पर कवियों-कलाकारों का ही विशेषाधिकार नहीं है. इस संसार में हमेशा से कुछ ऐसे लोग रहे हैं, आज भी हैं और हमेशा रहेंगे, जिनके दरवाजों पर अंत:प्रेरणा दस्तक देती है. ये वे तमाम लोग हैं, जो अंतरात्मा की आवाज सुनते हैं और अपना काम भरपूर प्रेम और कल्पना में डूबकर करते हैं. डौक्टर, शिक्षक, माली और सैकड़ों ऐसे लोग हो सकते हैं. जब तक वे अपने काम में नयी-नयी चुनौतियों को खोजते रहते हैं, उनका काम अनवरत रोमांच से भरा रहता है. मुश्किलें एवं असफलताएं उनकी जिज्ञासाओं का शिथिल नहीं कर पातीं. ये लोग जिस किसी समस्या को सुलझाते हैं, उसी में से तमाम तरह के नये-नये प्रश्न उभरते हैं. अंत:प्रेरणा चाहे जो हो, वह एक अनवरत अहसास….. ‘मुझे नहीं मालूम’ की अभिव्यक्ति से जन्म लेता है. 

लेकिन इस संसार में इस तरह के लोग ज्«यादा नहीं हैं. धरती पर अधिकांश लोग बस किसी तरह जीते चले जाते है. वे काम करते हैं क्योंकि उन्हें काम करना पड़ता है. उन्होंने इस काम या उस काम को इसलिए नहीं चुना कि उसमें एक नशा, उन्माद है, बल्कि उनकी जिंदगी की परिस्थितियों ने उस काम को उनके लिए निर्धारित कर दिया है. इस तरह के प्रेमविहीन कार्य, एक उबाऊ किस्म के काम, जिनका महत्त्व सिÒ«îá इसलिए है कि दूसरों के पास तो वह भी नहीं है/ यह मनुष्य के जीवन की सर्वाधिक भयावह विडम्बन है. और अभी इसके कोई आसार नजर नहीं आते कि आने वाली सदियों में इस ढर्रे में कोई परिवर्तन होगा. इसलिए हालांकि मैं अंत:प्रेरणा पर केवल कवियों का एकाधिकार नहीं मानती, पर फिर भी मैं उन्हें उन कुछ खास लोगों में गिनती हूं जिन पर नियति की कृपा रही है. 

इससे मेरे श्रोताओं के मन में कुछ शंकाएं पैदा हो सकती हैं. तमाम तरह के उत्पीड़क, तानाशाह, कट्टर और मतांध व्यक्ति, लोगों को उकसाने वाले, नारे उछालकर-लगाकर ताकत हथियाने में जुटे हुए लोग- इन सब को भी अपने काम में बड़ा आनंद आता है. ये सब भी अपने काम को कल्पनाशीलता भरे जोशो-खरोश के साथ अंजाम देते रहते हैं. बेशक! यह सच है. पर यह भी सच है कि वे ‘जानते हैं’ और जो कुछ, जितना उन्होंने जाना होता है, वही उनके लिए हमेशा हमेशा के लिए पर्याप्त होता है. वे और कुछ खोजना नहीं चाहते, क्योंकि हो सकता है नया जानना उनके तर्कों की ताकत को कम कर दे. पर कोई भी ज्ञान जो नये प्रश्नों की ओर लेकर नहीं जाता, जल्दी ही खत्म हो जाता है. लगातार जीते चले जाने के लिए जो ताप चाहिए ऐसा ज्ञान उस ताप को बनाये नहीं रख सकता. कुछ अतिवादी मामलों में तो ऐसा ज्ञान समाज के लिए विनाशक भी साबित हुआ है. प्राचीन और आधुनिक इतिहास में इसके बहुत से उदाहरण मिल जाएंगे. 

यही वजह है कि इस छोटे से कथन – ‘मैं नहीं जानती’ को मैं इतना ऊँचा स्थान देती हूं. यह छोटा-सा कथन है, पर इसकी उड़ान बहुत ऊंची है. यह हमारे जीवन को विस्तार देता है ताकि उसमें हमारे भीतर की खाली जगहें और वह बाहरी विराटता भी शामिल हो सके जिसमें हमारी यह छोटी-सी धरती जाने कब से तैर रही है. यदि आइजेक न्यूटन स्वयं से यह नहीं कहता कि ‘मैं नहीं जानता’, तो उसके छोटे से बगीचे में सेबों की बरसात भी होने लगती तो क्या होता! अधिक से अधिक यह होता कि वह »ाुककर उन्हें उठाता और चपड़-चपड़ भकोस जाता. मेरी हमवतन मादाम क्यूरी यदि खुद से यह नहीं कहती कि ‘मैं नहीं जानती.’ तो शायद वह एक अच्छे परिवारों से आयी लड़कियों को एक निजी हाईस्कूल में रसायनशास्त्र ही पढ़ाती रहती और एक प्रतिष्ठापूर्ण नौकरी में ही उसका जीवन बीत जाता. लेकिन वह लगातार कहती रही कि ‘मैं नहीं जानतीं’ और ये शब्द उसे एक नहीं, दो बार स्टौकहोम की धरती पर ले आये, जहां बेचैन और प्रश्नाकुल आत्माओं को यदा-कदा नोबल पुरस्कारों से नवाजा जाता है. 

कवि, यदि सच्चा है तो उसे भी बार-बार यह दोहराना होगा कि ‘मैं नहीं जानता’. हर कविता इसी कथन का जवाब देने का प्रयास करती है. पर जैसे ही चरमावस्था पृष्ठ पर अंकित होना चाहेंगी, कवि पुन: संदेह से भर उठेगा. उसे लगेगा की उसका यह उत्तर तो पूरी तरह गढ़ा हुआ है, अपर्याप्त है. इसलिए कवि लगातार प्रयास करता रहेगा और देर-सवेर उनके इस बेचैनी और प्रश्नाकुलता के परिणामों को उनकी कृतियां कहा जाने लगता है और साहित्यिक इतिहासकारों द्वारा उन पर विशालकाय कागजी बिल्ले चस्पां कर दिये जाते हैं. 

कभी-कभार मैं एक ऐसी स्थिति का स्वप्न देखती हूं जिसका सच होना सम्भव नहीं है. मैं एक जिद के साथ यह कल्पना करती हूं कि मैं सभी मानवीय प्रयासों की नि:सारता के उस हदयविदारक शोकगीत लिखनेवाले एक्लेसिएस्टेस के साथ गपशप कर रही हूं. मैं उसके सम्मुख नतमस्तक हो गयी हूं क्योंकि कम से कम मेरे लिए तो वह संसार के महानतम कवियों में से हैं. मैं उसका हाथ थामकर कहूंगी, “इस आसमान के नीचे नया कुछ भी नहीं है – यही तो तुमने लिखा है न एक्लेसिएस्टेस! पर तुम तो खुद इस आसमान के नीचे एकदम नये हो. तुमने जो कविता रची वह भी तो इस आकाश के तले एकदम नयी कविता है, क्योंकि तुमसे पहले ऐसा किसी ने नहीं रचा. और तुम्हारे पाठक भी इस धरती पर एकदम नये हैं, क्योंकि जो तुमसे पहले यहां मौजूद थे वे तो तुम्हारी कविता को पढ़ ही नहीं पाये. और यह जो सरु के वृक्ष के तले बैठे हो वह भी सृष्टि के आरम्भ से यहां नहीं रहा है. इससे पहले दूसरे सरु के वृक्ष अस्तित्व में आये थे पर उनमें से कोई इस वृक्ष के जैसा नहीं था. और एक्लेसिएस्टेस मैं तुमसे यह भी पूछना चाहती हूं - अब इस आकाश के तले किस नयी रचाना को लिख रहे हो? जो विचार तुम पहले भी अभिव्यक्त कर चुके हो, क्या उन्हीं को आगे बढ़ाओगे? या शायद उनमें से ही किसी बात को खारिज करने का तुम्हारा मन हो रहा है? तुमने अपनी पिछली रचना में सुख के बारे में कुछ कहा था. क्या फर्क पड़ता है यदि यह क्षणिक है! शायद इस आकाश के नीचे अब तुम्हारी नयी कविता फिर से सुख के बारे में हो? क्या तुमने कुछ टिप्पणियां दर्ज की हैं; क्या पहला मसौदा तैयार हो गया है? मु»ो पूरा संदेह है कि तुम कहोगे - हां, मैं सब कुछ लिख चुका हूं और नया लिखने को कुछ नहीं है मेरे पास.” दुनिया का कोई कवि ऐसा नहीं है जो यह कह सकता हो. और तुम जैसा महान कवि तो कदापि नहीं.” 

इस संसार की विराटता और अपनी नपुंसकता को लेकर जब हम भयभीत होते हैं तो चाहे जो सोचें; मनुष्यों, पशुओं और यहां तक कि पेड़-पौधों के अपने-अपने दुखों के प्रति इस संसार की उदासीनता (हमने यह क्यों मान लिया कि पेड़-पौधों को तकलीफ नहीं होती?) से हम चाहे जितने क्षुब्ध हों; हम इस धरती के विस्तार के बारे में जैसा भी सोचते हों, यह विस्तार उन सितारों से आने वाली रोशनी की किरणों से छिपा हुआ है जो इसे चारों तरफ से घेरे हुए है और जिन्हें अभी तो हमने खोजना आरम्भ ही किया है. क्या वे सितारे मर चुके हैं? क्या अभी भी वे मृत हैं? हमें कुछ नहीं मालूूम. यह अनंत और अपरिमित रंगभवन जिसमें हम आरक्षित टिकट लेकर बैठे हुए हैं, हम इसके बारे में जो भी सोचते रहें पर इन टिकटों की मियाद हास्यास्पद रुप में बहुत छोटी है. इन टिकटों को दो निरंकुश तारीखों ने घेरा हुआ है. हम इस दुनिया के बारे में जो कुछ सोचते रहें, पर यह बहुत विस्मयकारी दुनिया है. 

पर इसे ‘विस्मयकारी’ कहना इसे एक ऐसे विशेषण से युक्त करना है जिसमें उसका तार्किक ताना-बाना छिप जाता है. आखिरकार हमें उन्हीं चीजों से तो विस्मय होता है जो कुछ जाने-पहचाने और सर्वत्र स्वीकार्य मानदंडों से परे हटती हैं; जो उस प्रत्यक्षता से दूर चली जाती हैं जिसके हम आदि हो चुके होते हैं. किंतु सच तो यह है कि स्वत: स्पष्ट संसार जैसा कुछ भी नहीं होता. हमारा विस्मित होना स्वभावगत है और यह किसी और से तुलना पर आधारित नहीं है. 

माना कि अपनी रोजमर्रा की बातचीत में हम हर शब्द सोच-विचारकर नहीं बोलते. ‘साधारण दुनिया’, ‘आम जीवन’, ‘सामान्य परिस्थितियां जैसे तमाम जुलमों का हम धड़ल्ले से इस्तेमाल करते हैं. पर कविता में जहां हर शब्द का वजन है, कुछ भी सामान्य या साधारण नहीं होता – न कोई पत्थर, न उस पर हुआ एक बादल का टुकड़ा, न कोई दिन, न उसके बाद आने वाली रात और न ही कोई अस्तित्व, चाहे वह दुनिया में किसी का भी असित्व हो. 

ऐसा लगता है कि इस दुनिया में कवियों के पास हमेशा वे काम होंगे जो केवल उन्हीं के लिए बने होंगे. 

{fcomment}

 

Read more: कवि और दुनिया

खूबसूरती की सरहद का एक और द्वार

Translation of "The night I met Einstein" by Anuradha Mahendra   394244d16629b33d628b6e4ebfab75cf

लेखक: जेरौम वीडमैन (Jerome Weidman)1913-1998

अनुवादक: अनुराधा महेंद्र 

 

जेरौम वीडमैन का परिचय 

कहानीकार, उपन्यासकार एवं नाटककार के रूप में विख्यात जेरोम वीडमैन का जन्म 14 अप्रैल 1913 में मेनहटन,न्यू यार्क सिटी में हुआ था. उनके पिता एक यहूदी अप्रवासी और कपड़े के व्यापारी थे, इसलिए कुछ अरसे तक उन्होंने खुद भी वस्त्र उद्योग के क्षेत्र में काम किया और अपने इस क्षेत्र के  अनुभव को अपने लेखन में भी जगह दी है. अपनी मेहनत की कमाई से ही उन्होंने महाविद्यालय और विश्वविद्यालय की पढ़ाई पूरी की. इसी दौरान उन्होंने कहानियां लिखना शुरू कर दिया और कालांतर में उपन्यास भी लिखे. अपनी कहानियां में उन्होंने कारोबार और राजनीति के दांवपेंच और न्यूयार्क के दैनिक जीवन के बारे में खूब कलम चलाई है. कहानी कला में बेजोड़ महारत के अलावा उन्होंने फिल्मों में संवाद लेखन के रूप में भी अपनी क्षमता का परिचय दिया. अपनी इसी क्षमता के चलते न्यूयार्क के बेहद प्रसिद्ध फिल्मकार, निर्माता, निर्देशक जार्ज एबोट के साथ मिलकर एक संगीतात्मक नाटक ’फियोरेलो’ रचा, जिसे 1960 में पुलत्जिर पुरस्कार प्राप्त हुआ. उनके उपन्यासों एवं कहानी संग्रहों की एक लंबी फेहरिस्त है.

अल्बर्ट आइन्सटाइन के विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान से संसार भर में सभी परिचित हैं लेकिन संगीत में उनकी गहरी रुचि और ज्ञान के बारे में कम लोग ही जानते हैं. संगीत की बारीकियों, जटिलताओं की उनकी समझ अढ़्भुत थी। यहाँ इंग्लैंड  के प्रसिद्ध कथाकार जेरोम विडमन ने दुनिया के इस विश्व विख्यात वैज्ञानिक से अपनी मुलाक़ात का जो विवरण दिया है उससे संगीत में उनकी रुचि के अलावा उनके व्यक्तित्व की जिन खूबियों का पता चलता है वह मन को गहरे छू जाता है। ये वे खूबियाँ हैं जो किसी भी व्यक्ति को महान बनाती हैं और उसके संपर्क में आनेवाले हर शख्स को उसका मुरीद बना देती हैं। एक महान शिक्षक के रूप में इस विश्वविख्यात वैज्ञानिक ने जो गुर लेखक को सिखाये वे एक मधुर स्मृति के रूप में जीवन का विलक्षण अनुभव बनकर उन्हें ताउम्र प्रेरित करते रहे.

 

यह उन दिनों की बात है जब मैं किशोर उम्र का था और अपने जीवन की राह तलाशनी शुरू ही की थी. मुझे न्‍यूयार्क के लोकहित से जुड़े एक प्रतिष्ठित दानी के घर रात की दावत में शरीक होने का न्‍यौता मिला. भोजन के बाद हमारी मेजबान हम सबको अपने घर के विशाल ड्राइंग रुम में ले गई. कई सारे मेहमान अब भी पधारे रहे थे. वहाँ का नजारा देख मेरे पसीने छूट गए। मैंने देखा कि हाल में नौकर एक के पीछे एक करीने से छोटी कुर्सियाँ सजा रहे थे और सबसे आगे दीवार से टिकाकर वाद्ययंत्र रखे गए थे। जाहीर था मुझे संगीत के कार्यक्रम में शामिल होना पड़ेगा।

 

'होना पड़ेगा' मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि संगीत में मेरी कोई रुचि नहीं थी और मुझे इसका लेश मात्र भी ज्ञान नहीं था। सच कहूँ तो मैं संगीत के लिहाज से बहरा....या कहें कि एकदम पैदल था। सहज सी धुन भी मैं गुनगुना नहीं पाता था और गंभीर किस्म का कोई भी संगीत मेरे लिए शोर से ज्यादा कुछ नहीं था। इसलिए मैंने वही किया जो इस तरह की स्थिति में घिर जाने पर अक्सर करता था। मैं एक कुर्सी पर चुपचाप बैठ गया और जब संगीत शुरू हुआ तो चेहरे पर संगीत की गहरी समझ का भाव चस्पाँ कर लिया, भीतर से कान बंद कर लिये और खुद को बेतरतीब ख़यालों में डुबो दिया.    

 

कुछ देर बाद जब मैंने आस-पास के लोगों को दाद देते देखा तो मुझे लगा अब मैं अपने कान खोल सकता हूँ. उसी पल दायीं तरफ से मुझे कोमल पर गज़ब की भेदती आवाज सुनाई दी –"क्या तुम्हें बाख का संगीत पसंद है?" उस स्वर ने पूछा।

 

मुझे बाख के बारे में उतनी ही जानकारी थी जितनी न्यूक्लियर विखंडन की, लेकिन दुनिया भर में मशहूर चेहरों में से एक चेहरा जो इस वक्‍त मेरी बगल में बैठे थे, उनसे बेतरतीबी से बिखरे सफ़ेद बालों और मुंह में दबे पाइप की वजह से मैं बखूबी वाकिफ था। हाँ, मैं अल्बर्ट आइन्सटाइन की बगल में बैठा था.

 

"हूँ" असहजता और हिचकिचाहट से भर मैंने कहा.

 

मुझसे एक सहज सा सवाल किया गया था जिसका मुझे भी सहज सा जवाब देना था, पर अपने पड़ोसी की असाधारण आँखों में जो भाव था उससे मैं समझ गया कि वे शिष्टता के नाते महज रस्मी औपचारिकता नहीं निभा रहे हैं. इस मौखिक आदान-प्रदान का मेरे लिए चाहे जो महत्व हो पर मैं जानता था कि इस व्यक्ति के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है. और फिर सबसे महत्‍वपूर्ण बात यह थी इतनी बड़ी शक्सियत को कोई भला कैसे झूठ बोल सकता है बेशक कितना छोटा ही क्यूँ न हो?  

 

"मैं बाख के बारे में कुछ नहीं जानता?" मैंने बड़े संकोच से कहा. "मैंने आज तक उनका कोई संगीत नहीं सुना है?"

आइंस्टीन के संवेदनशील चेहरे पर असमंजस भरे आश्चर्य का भाव तेजी से उभरा. "तुमने बाख को कभी नहीं सुना?"

 

उनके स्वर में ऐसा भाव था मानो मैंने कह दिया हो कि मैं आज तक कभी नहीं नहाया.

 

"ऐसा नहीं कि मैं बाख को पसंद नहीं करता, या पसंद नहीं करना चाहता, दरअसल सुर ताल के लिहाज से मैं एकदम बहरा हूँ और सच तो यह है कि आज तक मैंने किसी का संगीत नहीं सुना."

यह सुनते ही उस उम्रदराज बूढ़े के चेहरे पर चिंता का भाव उभर आया. सहसा वे बोले, "प्लीज तुम मेरे साथ आओ."

 

वे खड़े हो गए और मेरा हाथ थाम लिया. भीड़ भरे उस विशाल कमरे में से जब वे मुझे हाथ पकड़ कर ले जा रहे थे तो शर्म के मारे मैंने अपनी नजरें जमीन में ही गड़ाए रखीं. हमारे इस तरह बीच में उठकर जाने से चकित लोगों की  फुसफुसाहट पीछे हाल में से साफ सुनाई दे रही थी पर आइंस्टीन ने उस पर ध्यान नहीं दिया.

 

दृढ़ कदमों से वे मुझे सीढ़ियों से ऊपर ले गए. जाहिर है वे उस घर से बखूबी परिचित थे. ऊपर की मंजिल पर पहुँचकर उन्होंने एक कमरे का दरवाजा खोला जहां करीने से किताबें रखीं हुईं थी, मुझे भीतर ले जाकर दरवाजा बंद कर दिया.

 

"अब" वे हल्की पर तकलीफ भरी मुस्कान बिखेरते हुए बोले, "प्लीज मुझे यह बताओ कि संगीत को लेकर तुम कब से ऐसा सोचते हो?"

 

"सदा से" मैंने डरते हुए कहा. "मेरा ख्याल है आप नीचे जाएँ डॉ आइंस्टीन, क्योंकि मेरे संगीत पसंद करने या नहीं करने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता."

 

उन्होंने तुरंत नहीं में सिर हिलाया और उनकी भोहें तन गईं, मानो मैंने कोई बेहूदा बात कह दी हो.

 

"प्लीज मुझे बताएं कि क्या ऐसा कोई भी संगीत है जिसे तुम पसंद करते हो?"

 

"मुझे ऐसे गाने पसंद हैं जिनमें शब्द होते हैं कुछ ऐसा जिसकी धुन को मैं पकड़ सकूँ?"

 

"वे मुस्कराये और खुश होकर गर्दन हिलाई, कोई उदाहरण दे सकते हो?"

 

"हाँ," मैंने साहस करते हुए कहा, "बिंग क्रोस्बी का कोई भी गीत."

 

उन्होंने फिर जोर से गर्दन हिलाई, "बहुत बढ़िया!"

 

वे कमरे के कोने में गए, फोनोग्राम खोला और रिकॉर्ड निकालने लगे. मैं असहज होकर देखता रहा. आखिर वे खुशी

से उछलकर बोले, "ये रहा!"

 

उन्होंने रिकॉर्ड लगाया और पल भर में ही कमरा बिंग क्रोस्बी के एक मंद, मधुर, गीत "When the Blue of the Night meets the God of the day" की स्वरलहरी से गूंज उठा, आइंस्टीन मुझे देख मुस्कराये और अपने पाइप की नली से समय निर्धारित किया. तीन या चार वाक्यांशों के बाद उन्होंने ग्रामोफोन बंद कर दिया.

 

"अब मुझे बताओ जो तुमने अभी अभी सुना?"

 

इसका सरल सा जवाब देने के लिए मैंने वही पंक्तियाँ गुनगुना दीं. मैंने भरसक कोशिश की कि धुन पर रहकर अपनी आवाज को टूटने न दूँ. उस वक़्त आइंस्टीन का चेहरा सूरज की भांति दमक उठा.

 

"तुमने देखा," यह कह वे खुशी से उछल पड़े. "तुम संगीत में बहरे नहीं हो."

 

मैंने धीमे से बताया कि यह मेरा एक सबसे प्रिय गीत है और इसे मैं सौ एक बार तो सुन ही चुका हूँ, इसलिए इससे कुछ भी साबित नहीं होता।

 

"बकवास!" वे बोले, "इससे सब कुछ साबित होता है, क्या तुम्हें स्कूल में पढ़ाया गया गणित का पहला पाठ याद है? मान लो संख्याओं से पहली बार वास्ता पड़ते ही तुम्हारी टीचर ने यदि तुम्हें जटिल भाग व घटा की समस्या का हल निकालने के लिए दिया होता तो क्या तुम कर पाते?"

 

उन्होने पाइप को बाहर निकाल फिर मुंह में रख लिया.

 

     स्कूल के पहले दिन कोई भी शिक्षक इस किस्म की मूर्खता नहीं कर सकता. हर किसी को पहले छोटे-छोटे हल निकालने के लिए दिये जाते हैं और सहज समस्याओं पर दक्षता हासिल कर लेने के बाद ही गणित के बड़े-बड़े सवालों के  हल निकालने के लिए कहा जाता हैं.

 

     "संगीत के साथ भी ऐसा ही होता है." आइन्स्टीन ने बिंग क्रोस्बी का रिकॉर्ड उठाया और बोले, "यह सहज और मनभावन गीत साधारण जमा घटा की तरह ही है, तुमने इसमें दक्षता पा ली है. अब हम थोड़े और जटिल संगीत की तरफ बढ़ते हैं."

 

     उन्होंने एक और रिकॉर्ड निकालकर चला दिया. जॉन मैक कौरमक्क की मखमली आवाज पूरे कमरे में गूँजने लगी. कुछ देर बाद आइन्सटाइन ने रिकॉर्ड बंद कर दिया.

 

     "हाँ, तो क्या तुम यह गीत मेरे लिए फिर गाओगे?" 

 

     मैंने बड़े संकोच से गीत गुनगुना शुरू किया, यह देख खुद मैं भी चकित था कि मैं काफी हद तक निभा ले गया. आइन्सटाइन के चेहरे पर जो भाव था वैसा भाव मैंने अपने जीवन में इससे पहले सिर्फ एक बार देखा था: अपने पिता के चेहरे पर जब उच्च स्कूल की शिक्षा पूरी कर लेने के बाद विदाई समारोह में उन्होंने मेरा भाषण सुना था.        

जब मैंने गीत पूरा किया तो आइन्सटाइन बोले, "बहुत खूब, वाकई उम्दा... अब यह !"

 

अब उन्होंने जो गीत चलाया वह मेरे लिए एकदम अनजाना था, पर फिर भी मैंने किसी तरह उस गीत को भी गाकर सुना दिया. आइन्सटाइन ने मुस्कराते हुए सहमति दी.

 

'करुसो' के इस गीत के बाद कम-से-कम दर्जन भर और गीत मुझे सुनाये गए. मैं इस महान शख्सियत के प्रति श्रद्धा से भर उठा, जिनसे मैं इत्तफाक से ही मिला था और मुझे संगीत के गुर सिखाने में वे इस कदर डूब गए थे मानो यही उनकी एकमात्र चिंता हो.    

 

उसके बाद बिना गीत वाले संगीत को सुना, जिनमें शब्द नहीं थे, उस धुन को भी हौले से गुनगुनाने के निर्देश दिये गए. जब मैं उच्च स्वर पर पहुंचा तो   आइन्सटाइन मुंह खोल अपने सिर को एकदम पीछे ले गए ताकि मैं स्वर की उस ऊंचाई तक पहुँच सकूँ जो मुझे मुश्किल लग रहा था, उनकी मदद से मैं काफी हद तक निभा सका और फिर उन्होंने ग्रामोफोन बंद कर दिया.

 

फिर मेरे गले में बाँह डालकर स्नेह से बोले, "प्यारे नौजवान अब हम बाख को सुनने के लिए तैयार हैं."

ड्राइंग रूम में जब हम अपनी कुर्सियों पर लौटे तो संगीतकार नयी धुन शुरू कर रहे थे. आइन्सटाइन मुस्कराए और मेरे घुटने को थपथपाकर मुझे आश्वस्त किया, "बस खुद को संगीत में बहने दो" वे फुसफुसाकर बोले।

यह सब इतना आसान नहीं था. एक नितांत अजनबी के लिए उन्होंने जो मेहनत की थी उसे बयां करना नामुमकिन है? मैं शायद कभी इस तरह संगीत नहीं सुन पाता जैसा अपने जीवन में पहली बार उस रात मैंने बाख को सुना- "Sheep may Safely Graze." उस रात के बाद न जाने कितनी बार मैंने इस संगीत को सुना है.... मुझे नहीं लगता कि मैं कभी भी उसे सुनकर थकूँगा, क्योंकि इसे सुनते वक्‍त मैं कभी अकेला नहीं होता. बेतरतीबी से बिखरे बालों और दांतों के बीच दबे बुझे पाइप वाले एक नाटे, गोल-मटोल व्यक्ति के साथ होता हूँ जिनकी असाधारण स्नेह भरी आँखों में दुनिया का विस्मय झलकता है.    

 

जब संगीत समारोह समाप्त हुआ तो तमाम दूसरे लोगों की तरह मैंने भी  दिल से दाद दी.

 

अचानक हमारी मेजबान से जब हमारा सामना हुआ तो मुझ पर सर्द  निगाह डालते हुए वह बोली, "डॉ. आइन्सटाइन, मुझे खेद है कि संगीत का एक बड़ा हिस्सा आप सुन नहीं पाये.

 

आइन्सटाइन और मैं तुरंत खड़े हो गए. "मुझे भी खेद है." वे बोले, "मेरा यह नौजवान साथी और मैं दरअसल एक ऐसे काम में लगे हुए थे, जिसकी ईश्वर ने हर मनुष्य को काबलियत दी है."

 

"सच" उसके चेहरे पर असमंजस का भाव था, "हाँ तो वह कौन सा काम है?"

 

आइन्सटाइन के चेहरे पर मुस्कराहट खिल उठी और उन्होंने स्नेह से मेरे कंधे में बांह डालकर दस शब्द कहे जो एक शक्स जो ताउम्र उनका ऋणी है, के हृदय पर स्मृति लेख की तरह सदा के लिए अंकित हो गए -

 

" खूबसूरती की सरहद का एक और द्वार खोलने का काम''

{fcomment}

 

Read more: खूबसूरती की सरहद का एक और द्वार